मेघावियों ने आत्मा के नाम से इस घटना का विश्लेषण करने का प्रयास किया। यह अध्ययनगम्य हो नहीं पाया।
बोध के लिए सम्पूर्ण वस्तु सहअस्तित्व ही है। जानने-मानने की संतुलन स्थिति का नाम है बोध। इसका तृप्ति बिंदु ही अनुभव है। यही जीवन जागृति है। अनुभव मूलक विधि से आनन्द और धी अपने आप में जागृति का ही प्रमाण है। अनुभव मूलक बोध आनन्द में सम्पूर्ण सहअस्तित्व स्पष्ट रहता ही है इसलिए अनुभव, प्रमाणिकता सहित आनन्द, धी सहज स्वीकृति के आधार पर अस्तित्व बोध और धृति क्रियाकलाप सुदृढ़ रूप में कार्यरत होना पाया जाता है। फलस्वरूप अनुभव मूलक सत्यता सहज चिंतन-चित्रण और तुलन-विश्लेषण समेत मूल्य, चरित्र,नैतिकता पूर्ण आस्वादन चयन क्रियाकलाप ही जागृत मानव परम्परा में सार्थक क्रियाकलाप है।
जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयतापूर्ण आचरण सहज अध्ययन विधि से जानने-मानने वाली क्रिया बुद्धि में ही संपन्न होता है। जिसके तृप्ति के लिए अध्ययन क्रियाकलाप के साथ ही जीवन का दृष्टा पद साक्षी के रूप में नियोजित रहता ही है। फलतः आनन्द, धी, अस्तित्व बोध और धृति का स्वीकृति अनुभव प्रमाण के लिए स्वरित गतित रहता ही है।
इसी विधि में आत्मा में स्वीकृति का नाम ही तृप्ति बिंदु है, यही प्रमाणिकता का सूत्र है। इसी गरिमा संपन्न अनुभव विधि से आनन्द, धी, अस्तित्व बोध और धृति के लिये अनुकंपित रहता ही है अतएव चिंतन-चित्रण, तुलन-विश्लेषण, आस्वादन और चयन सहज क्रियाकलाप संपन्न होता है। इसी का नाम अनुभव मूलक क्रियाकलाप है। अतएव अनुभव सहज विधि से जानने-मानने की क्रिया संपन्न होता है।
मानव परम्परा में अध्ययन की सम्पूर्ण वस्तु अस्तित्व, अस्तित्व ही सहअस्तित्व, अस्तित्व में परमाणु में विकास, संक्रमण, जीवन पद, जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जागृति और रासायनिक-भौतिक रचना- विरचनाओं का बोध होना है। यही सार्थक अध्ययन है।
फलस्वरूप मानव के लिए ही जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज रूप में समझ में आता है। अध्ययन विधि से अस्तित्व बोध के अनंतर ही मानव में अनुभव पूर्वक पूर्णता और उसकी निरंतरता की आवश्यकता और प्रयोजन बोध होता है। इसी के फलस्वरूप ही मानवीयता पूर्ण आचरण प्रमाणित होता है जो स्वयं ही समाधान, समृद्धि पूर्ण परिवार, समाज तथा समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सहज व्यवस्था मानव परम्परा में, से, के लिए