जीवन में अविभाज्य रूप में क्रियारत
आत्मा सहज दो आचरण
(1) अस्तित्व में अनुभव।
(2) आनंद सहज प्रमाणिकता।
अस्तित्व :- सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में नित्य वर्तमान।
आनन्द :- अस्तित्व में अनुभूति फलस्वरूप सत्यानुभूत जागृत जीवन इकाई में आत्मा, बुद्धि, चित्त, वृत्ति और मन अविभाज्य रूप में कार्यरत और जागृति को प्रमाणित करता है जागृत जीवन शरीर समेत व्यवहार में जागृति सहज प्रमाणों को प्रमाणित करता है यही जागृत मानव परम्परा सहज मौलिकता है।
जागृत जीवन सहज सभी क्रियाकलाप व्यवहार में प्रमाणित होने पर्यन्त मानव में अध्ययन कार्य परम्परा है। इसी सत्यता क्रम में अनुसंधानपूर्वक ही यह मनोविज्ञान सत्यापित है। अस्तित्व ही अस्तित्व रूप में सम्पूर्ण भाव है। जीवन ही जागृति पूर्वक दृष्टा पद में होने के फलस्वरूप अस्तित्व में अनुभव सहज है। सम्पूर्ण सहअस्तित्व चार अवस्था और चार पदों में स्थिति, गति, रूप, गुण स्वभाव, धर्म, विकास, जागृति और रचना-विरचना के रूप में होना ज्ञातव्य है। समझना जानने-मानने, पहचानने-निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित है। जानने-मानने की तृप्ति ही अनुभव के रूप में ख्यात है। पहचानना-निर्वाह करना जानने-मानने के उपरान्त सहज क्रिया है। जानना-मानना प्रधानतः स्वभाव, धर्म और स्थिति के रूप में समझा गया है।
अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व के रूप में विद्यमान और नित्य वर्तमान है। अस्तित्व सहज स्वरूप ही सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। अस्तित्व व्यापक में अनंत सहज वैभव के रूप में है। सत्तामयता व्यापक रूप में होना समझ में आता है। प्रकृति सत्ता में अनंत एक-एक के रूप में होना समझ में आता है। सत्ता पारगामी है। पारदर्शी है। सत्ता में प्रकृति संपृक्त है। एक-एक के रूप में प्रकृति सत्ता में संपृक्त वर्तमान है। सत्ता में अनंत इकाइयों के रूप में विद्यमान ऊर्जा संपन्न प्रकृति निरंतर क्रियाशील है। इसी स्थिति में सत्ता में प्रकृति संपृक्त है का प्रमाण सम्पूर्ण प्रकृति में ऊर्जा संपन्न, बल संपन्न क्रियाशीलता ही सत्ता सहज व्यापकता किन्हीं भी दो इकाईयों के बीच में रिक्त स्थली के रूप में दिखती है। यह रिक्त स्थली अनंतानंत इकाइयों के परस्परता में भी स्थिति में होना पाया जाता है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति सहज ऊर्जा संपन्नता सत्ता पारगामी होने का प्रमाण है।