पारदर्शिता का प्रमाण है कि परस्परता में सत्ता कितनी भी विशाल हो परस्पर इकाईयों का प्रतिबिंब परस्पर इकाइयों पर रहता ही है। इन प्रमाणों के आधार पर सत्ता अखंड, व्यापक, पारदर्शी, पारगामी होना सुस्पष्ट है। इसी के साथ यह भी समझ में आया है कि सत्ता स्वयं में तरंग और दबाव विहीन स्थिति पूर्ण वस्तु है। वस्तु इसीलिए कि वास्तविकता नित्य व्यक्त है। सहअस्तित्व ही सम्पूर्ण वस्तु और क्रिया है। क्रिया के रूप में जीवन क्रिया, भौतिक क्रिया और रासायनिक क्रिया में स्पष्ट तथा प्रमाणित है। मानव ही प्रमाणों का ज्ञाता दृष्टा है। प्रमाण सहज विधि से ही मानव तृप्त होने का अभ्यासी है, प्रवर्तनशील तो है ही। अतएव सहअस्तित्व सहज सम्पूर्ण भावों को, सम्पूर्ण क्रियाकलापों को, सम्पूर्ण अवस्था को, सम्पूर्ण पदों को, सम्पूर्ण स्थिति-गतियों को समझने, प्रमाणित करने और तृप्ति पाने का उम्मीदवार प्रयत्नशील सफल इकाई के रूप में मानव ही का होना स्पष्ट हो चुका है। यही स्पष्टता अनुभव मूलक विधि से इस मनोविज्ञान के रूप में सत्यापित हुआ है। इसका प्रमाण व्यापक सत्ता में ही अनंत रूपी प्रकृति संपृक्त ऊर्जा संपन्न बल संपन्न क्रियाशील है। यही साम्य ऊर्जा है। यह सम्पूर्ण प्रकृति के लिए पारगामी, पारदर्शीयता सहज रूप में समान है। इसी सत्यतावश साम्य ऊर्जा नाम दिया गया है। व्यापक वस्तु मूलतः ऊर्जा स्वरूप ही है। ऊर्जा वश ही सम्पूर्ण प्रकृति ऊर्जा की पारगामीयतावश भीगा हुआ है। फलतः ऊर्जा संपन्नता का प्रमाण प्रत्येक एक अपने मूल क्रिया के रूप में ही प्रमाण है। इसका पारदर्शी होना परस्पर इकाईयों में प्रतिबिंबन क्रिया के आधार पर प्रमाणित है। प्रत्येक एक ऊर्जा सम्पन्न, बल सम्पन्न है। इस आधार पर सम्पूर्ण प्रकृति का सत्ता में भीगा रहना प्रमाणित है।
यह नित्य समीचीन है। अनुभव जीवन सहज क्रिया है। प्रमाण मानव सहज क्रिया है। अध्ययन मानव सहज प्रक्रिया है। बोध जीवन सहज क्रिया है। बोध और अनुभव की तृप्ति ही एक मात्र उपलब्धि है। इसी तृप्ति को जीवन जागृति पूर्वक प्रमाणित करता है। यह तथ्य मानव सहज मौलिकता, जीवन सहज मौलिकता को स्पष्ट करता है कि मानव कुल में ही अध्ययन विधि है यह शरीर और जीवन का संयुक्त, संगीतमय स्थिति में संपन्न होने वाली मधुरिम क्रियाकलाप है। इसी क्रम में जीवन और शरीर को मौलिक रूप में समझना भी एक आवश्यक घटना रही। यह हमें भली प्रकार से समझ में आया है और इसे इसके पहले भी समुचित स्थलियों में स्पष्ट किया गया है। सत्यता यही है कि जीवन और शरीर के सहअस्तित्व में ही जीवन जागृति प्रमाणित होता है। मानव परम्परा में जागृति सहज आवश्यकता नित्य उदयशील है। नित्य वर्तमान में जागृति