मानव में, से, के लिए आवश्यक है ही। इस आवश्यकता की आपूर्ति सहज रूप में ही अर्थात् सहअस्तित्व सहज रूप में ही प्रमाणित होता है।
हर मानव जागृति पूर्वक ही प्रमाण प्रस्तुत कर पाते है। प्रमाणिकता सहज गति अनुभव बल का ही परावर्तन है। अनुभव जीवन में ही होता है। अध्ययन मानव परम्परा में ही होता है। यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता संपन्न सहअस्तित्व ही बोधपूर्ण होने की वस्तु है। बोध सहज क्रिया अध्ययन पूर्वक संपन्न होना जागृत मानव परम्परा में ही सहज सुलभ होता है। सत्यबोध सहज तथ्य उद्घाटन अनुभव मूलक विधि से ही संपन्न होना पाया गया है। जीवन में सत्य बोध प्रतिष्ठा के उपरांत अनुभव मूलक बोध होना एक सहज क्रिया है इसे हम भली प्रकार से समझे हैं। बोध सुलभ होने के लिए पंरपरा सहज अध्ययन प्रणाली पद्धति है। अनुभव मूलक अभिव्यक्ति संप्रेषणा अध्ययन के लिए वस्तु होना स्वाभाविक होता ही है। सत्य ही बोधगम्य होता है फलतः अनुभव होता है। बोध क्रिया में आत्मा का अनुभव साक्षी होना निहित रहता ही है। अनुभव के साक्षी में ही अध्ययन पूर्ण होता है। पूर्ण अनुभव होने का तात्पर्य ही सर्वतोमुखी समाधान रूप में प्रसवित, संप्रेषित अभिव्यक्त होने में है। अस्तु, यह मनोविज्ञान अनुभव मूलक विधि से किया गया सत्यापन ही है।
अनुभव सहज वैभव के लिए सहअस्तित्व ही नित्य स्रोत है। जानने-मानने का परम तृप्ति अनुभव है। परम तृप्ति का तात्पर्य अक्षुण्णता से है। यही प्रमाणिकता है। जानने-मानने का स्रोत जागृत मानव परम्परा ही है। इस विधि से हर जागृत मानव प्रमाण का आधार होना स्पष्ट होता है। सहअस्तित्व में अनुभव परम तृप्ति के अर्थ में प्रमाणित होना ही प्रमाणिकता का स्रोत है। तृप्ति का तात्पर्य अक्षुण्ण सहज वैभव है। इस विधि से अनुभव ही जागृति सहज वैभव है। ऐसा वैभव प्रभाव सहअस्तित्व सहज होना पाया गया है। इसी सत्यतावश तृप्तिपूर्ण अनुभवपूर्ण अनुभव प्रभाव जीवन सहज सम्पूर्ण क्रिया में प्रभावित होना स्वाभाविक है। जीवन शक्ति और बल अनुभव प्रभाव में अभिभूत (अभिभूत होने का तात्पर्य तृप्ति से है) होना पाया जाता है।
अनुभव करने वाली वस्तु जीवन में अविभाज्य आत्मा है। अनुभव के उपरान्त बुद्धि, चित्त, वृत्ति मन, अनुभव सहजता के अनुरूप अभिभूत क्रिया पूर्वक कार्य संपादित करती हैं। अभिभूति ही अनुभव का प्रभाव है। इस विधि से यह भी अध्ययनगम्य होता है कि जीवन ही आशामय, विचारमय, इच्छामय, संकल्पमय और प्रमाणमय विधियों से जीता है। यही जागृति मूलक विधि से जीने का स्वरूप है। अस्तित्व सहज यथार्थता,वास्तविकता, सत्यता, स्थिति सत्य,