किया है। जीवन में कार्यरत मन में ही सुख और स्फुर्ति की गवाही अथवा प्रमाण संप्रेषित होता है।

जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखते हुए आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाणिकता को वर्तमान में प्रमाणित करता है। यही वर्तमान में विश्वास का तात्पर्य है यही स्वयं में व्यवस्था एवं समग्र व्यवस्था में भागीदारी का प्रमाण है। इसी विधि से जीवन में, से, के लिए सुख, समाधान और व्यवहार व्यवस्था कार्यों में प्रमाणित करने के लिए स्फुर्ति नित्य उत्सव के लिए होना पाया जाता है। यह हर जागृत मानव में प्रमाणित होने की सम्भावना समीचीन है ही।

जीवन्त शरीर के माध्यम से ही हर जीवन मानव परम्परा में प्रमाणों को प्रस्तुत करना सार्वभौम अभीष्ट है। अभीष्ट का तात्पर्य अभ्युदय को इष्ट के रूप में स्वीकारा जाना। अभी ऐसा अभीष्ट, सहजता का तृप्ति ही सुख, शांति संतोष, आनन्द के नाम से जीवन सहज तृप्ति होता है। तृप्ति का प्रमाण समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में संप्रेषित-प्रकाशित हो जाता है। इस प्रकार जीवन सहज बलों की अभिव्यक्ति, जीवन सहज शक्तियों की संप्रेषणा और जीवन सहज कार्य व्यवहार भागीदारियों का प्रकाशन सुस्पष्ट है।

आशा :- (1) सुखापेक्षा सहित आस्वादन क्रिया। (2)आशयपूर्वक की गई आस्वादन क्रिया। (3) चैतन्य इकाई की अन्तिम परिवेशीय (चतुर्थ परिवेशीय) अक्षय जीवन शक्ति का वैभव।

सुख :- (1) न्याय के प्रति निष्ठा। (2) समाधान (उत्पादन + विनियम सुलभता रूपी समाधान) (3) सुख = विवेक सम्मत विज्ञान, विज्ञान सम्मत विवेक रूपी पूर्ण विचार शैली = समाधान।

जीवन जागृति संपन्न प्रत्येक मानव में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता सहज क्रियाकलाप स्पष्ट हैं। जागृति ही 122 आचरण रूप में मानव परम्परा में प्रमाणित होता है। इसी क्रम में चयन, रूचि, स्वागत, आस्वादन क्रियाओं में तत्पर रहता है। रूचियों में सुख भासता है। फलस्वरूप उसकी निरंतरता की आशा, आवश्यकता का उदय होता है। इसी तथ्यवश सुख की निरंतरता के लिए प्रयासोदय का जीवन जागृति विधि से ही स्फूर्ति होना जिसमें अनुभवमूलक विधि प्रमाणित व सार्थक रहना पाया जाता है। सुख की निरंतरता के लिए अनेक प्रकार से प्रयास करना स्पष्ट है। जैसे प्रत्येक मानव प्रत्येक कार्य को सुख की अपेक्षा में करता है। इसका प्रमाण स्पष्ट है कि सभी प्रकार की आशाएं सुखापेक्षा में हैं।

Page 81 of 205
77 78 79 80 81 82 83 84 85