मानव कुल के निरीक्षण-परीक्षण से पता चलता है कि सुख और उसकी निरंतरता संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन पूर्वक उभय तृप्ति के रूप में प्रभावित होता है। यह क्रिया निरंतर अनुभव में, से, के लिये स्रोत है। यही शुभ है। जीवन में अविभाज्य रूप से कार्यरत मन की प्रवर्तन क्रिया का नाम आशा है जो मूल्य मूलक प्रणाली के रूप में नित्य सुखद संभावना है।
सुख :- स्फूर्ति रूपी आशा, आशय (सुख) अपेक्षा के चयन रूपी स्वागत-आस्वादन आदि क्रियाएँ सम्पन्न करता है।
चैतन्य परमाणु में कार्यरत चतुर्थ परिवेशीय अंशों की मान्यता पर आधारित क्रिया का नाम ‘मन’ है जिसका गति रूप आशय सहित परावर्तन-प्रत्यावर्तन क्रियाकलाप है। मूलतः मानव के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सुख के अर्थ में सभी मान्यताएँ और मूल आशय भी सुख रूप होना अध्ययनगम्य है। मानव जीवन व जीवन जागृति में समानता समता व सहअस्तित्व की पहचान व निर्वाह सुख है। यह अभ्यास सिद्ध प्रमाण है। सहअस्तित्व अस्तित्व सहज नियति, जागृति सहज समता जीवन की नित्य अपेक्षा है। नैसर्गिक रूप में यह संतुलन है। सम्पूर्ण प्रकृति व्यापक सत्ता में नियंत्रित, संरक्षित होने के कारण सन्तुलन पूर्वक ही स्वभाव गति की मानव में अभिव्यक्ति है। स्वभाव, गति पूर्वक है। विकास-क्रम, विकास, जागृति और भौतिक रासायनिक रचना विरचनायें प्रमाणित होती है। मानव जागृति पूर्वक ही स्वभाव गति को प्रकाशित, प्रमाणित करता है इसलिए सुख-स्फूर्ति की सफलता मानव की जागृति पर निर्भर है।
39. पति/पत्नी 40. यतीत्व/सतीत्व
यतीत्व :- यत्न पूर्वक तरने के लिए, जागृति निर्भ्रमता और जागृति सहज निरंतरता के लिए किया गया सम्पूर्ण कार्य व्यवहार; निर्भ्रमता सहित की गई प्रक्रिया एवं प्रयास। यत्न अर्थात् शोधपूर्वक समझना ही तरना।
सतीत्व :- सत्व पूर्वक तरने, जागृत होने के लिए किया गया कार्य व्यवहार, समझ, प्रक्रिया समुच्चय; भ्रम मुक्ति। सत्व अर्थात् संकल्प निष्ठापूर्वक समझना ही तरना।
सत्व :- सहअस्तित्व पूर्वक अस्तित्व को सिद्ध करना।
विवाह संबंध को पति-पत्नी संबंध के नाम से जाना जाता है। मानव मानव से पहचान निर्वाह करता है जहाँ सेवा ली जाती है। सभी संबंध परिवार के ध्रुव है। परिवार में एक से अधिक व्यक्तियों का विश्वास पूर्ण सम्मिलित उत्पादन कार्य करना तथा संबंधों की पहचान, मूल्यों का