प्रत्येक मानव शांति व उत्सवपूर्वक दयापूर्ण कार्य व्यवहार को सम्पन्न करने में समर्थ होता है। दया का मुख्य कार्य विकास क्रम और जागृति सहज यथा स्थिति को बनाए रखना है। यही जीने देना ही दया है। जीने देने का तात्पर्य भी जो जैसा है उसको उसी विकास के बिंदु में सुरक्षित करना है। दया की दूसरी स्थिति और कार्य अविकसित के विकास में सहायक होना है। इस प्रकार से दोनों कार्य शांति पूर्वक ही सम्पन्न होना मानव में प्रमाणित है। जो लोग अभी तक इस प्रकार के कार्यों को करने में सफल हुए हैं वे सब शांति सहज जीवन को जिए हैं।
सम्पूर्ण संबंधों में दया का प्रवाह होता है। मानव मानव के साथ संबंधों को जब पहचानता है तब सेवा, अर्पण-समर्पण करने की उमंग अपने आप उमड़ती है। शांतिपूर्ण मानसिकता के धरातल पर ही ऐसा उद्गम होना पाया जाता है। यह केवल व्यक्ति में ही नहीं अपितु परिवार समुदाय तक भी ऐसे कार्यकलापों को देखा गया है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि प्रत्येक मानव शान्ति कामी और गामी है। गामी होने के लिए किसी परिवार, शिक्षा, राज्य व धर्म संस्थाओं में अपने को अर्पित करता है।
9. कृपा 10. करूणा
कृपा :- योग्यता, वस्तु के अनुरूप पात्रता उपलब्ध कराने वाली क्षमता।
करूणा :- (1) विकास के लिए उत्प्रेरित करना। (2) पात्रता और योग्यता, वस्तु उपलब्ध कराने में सहायक होना।
दया, कृपा, करूणा जागृत मानव का सहज स्वभाव है। प्रत्येक जागृत मानव सहज रूप में ही स्वानुशासित रहता है। दया का कार्य रूप पहले स्पष्ट किया जा चुका है और भी स्पष्ट करने के क्रम में यह है कि ऐसा कार्य जिससे हम पात्रता के अनुरूप वस्तु को उपलब्ध कराते हैं वह दया है। वस्तु के अनुरूप पात्रता न हो ऐसी स्थिति में उनको पात्रता प्रदान करना अथवा पात्रता की स्थापना करना कृपा है। यदि पात्रता व वस्तु दोनों न हो जिसकी उसे आवश्यकता हो ऐसी स्थिति में उनको वह दोनों सुलभ करा देना करूणा है। इस प्रकार कृपा और करूणा की प्रयोजनीयता समझ में आती है।
कृपा-करूणा परम जागृति की अभिव्यक्ति है। यहाँ प्रधान बिंदु यह है कि मानव ही अस्तित्व में जागृति पूर्ण सन्तुलित नियंत्रित हो पाता है। जबकि मनुष्येतर जीव प्रकृति वंशानुषंगीय विधि से, अन्न वनस्पतियाँ बीजानुषंगीय विधि से और सम्पूर्ण भौतिक-रासायनिक वस्तुएं परिणामानुषंगीय