5. स्नायु, 6. हड्डी और 7. वसा। इन धातुओं के रचना क्रम में एक दूसरे की तालमेल वाली संयोजना भी देखने को मिलती हैं। मूत्र तंत्र, गर्भ तंत्र, मल तंत्र, पाचन तंत्र, रस तंत्र, रक्त तंत्र, हृदय तंत्र, फुफ्फुस तंत्र, मेधस तंत्र, ये सब नाड़ियों, नसों, स्रोतसों, पेशियों से गुंथा हुआ दिखाई पड़ता है। इसी से पूरा शरीर तंत्र स्पष्ट होता है। इसमें जीवंतता सबसे पहली शर्त है। जीवंतता सहित ही जीव शरीर और मानव शरीर का संचालन जीवन से हो पाता है।
मानव शरीर अथवा जीव शरीर के साथ जीवन काम करने के लिए पहली शर्त समृद्घ मेधस का रहना बताया जा चुका है। और कौन सा ऐसा पहचानने का बिंदु है जहाँ से जीवन और शरीर का संयोग होना संभव हो जाता है। इसमें इसे भी एक ध्रुव बिंदु के रूप में परवर्ती (शरीर में मेधस तंत्र द्वारा जीवन के संकेतों को ग्रहण करने और जीवन संकेत भेजने का) कार्य संपादित होते रहती है। ऐसे सभी शरीर जीवन संयोग से चलने फिरने योग्य हो पाते है। जिन शरीरों में जीवन के संयोग से ही पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ कार्य कर पाती है, ऐसे शरीर में समृद्घ मेधस का होना पहचाना जा सकता है। इसके अलावा बाकी सभी प्रकार की रचनाएँ स्वेदज होना स्पष्ट है।
इससे यह पता चला कि प्रत्येक ऐसा शरीर जिसमें समृद्घ मेधस की रचना हो चुकी है और विभिन्न रस संयोग विधि से ही रक्त के रूप में परिवर्तित होता है, ऐसा तंत्र शरीर में रचित हो चुका है। ऐसे शरीर में ही मांस-मज्जा आदि वस्तुएँ देखने में आता है। ऐसे ही शरीर को जीवन संचालित कर जीने की आशा को जीव शरीरों में ही प्रमाणित करता है, जबकि मानव शरीर में आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता को प्रमाणित करता है, इसीलिए जीवन की अभिव्यक्ति के लिए हर जीव परंपरा में उन-उन शरीरों का होना एक सहज प्रक्रिया है। इसमें बल पूर्वक हस्तक्षेप कर, दुर्बल को सबल भक्षण करें, यही मांसाहार का तात्पर्य हुआ, जो विनियोजन के प्रकाश में स्वीकार्य नहीं है। शरीर का बल, तकनीकी संपन्न यांत्रिकी की रोशनी में, कैसा बौना हो जाता है, इस बात का स्पष्टीकरण जिसने पहली बार बंदूक से सिंह जैसे क्रूर जानवरों को मार गिराया था उसी दिन पता चल चुका था। आज के और भी अत्याधुनिक, मार्मिक, अत्यधिक मारक प्रभाव अर्थात् मारने वाले प्रभाव को रखने वाले बहुत सारे उपायों को मानव ने पा लिया है। इसमें किरण, विकिरण प्रणालियों को भी उपयोग करने की जगह में, समुन्नत तकनीकी द्वारा मानव लैस हो चुका है। इस प्रकार शरीर बल प्रभावशाली न रहकर, तकनीकी बल सर्वाधिक प्रभावशाली हो गया है। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि जीवन ही तकनीकी का उद् गाता है। अस्तु, मानव अब ठंडे दिमाग से सोचने के लिए बाध्य हो गया है।