अर्थशास्त्र में पढ़ाया जा रहा है- यह कहाँ तक सत्य है, कहाँ तक ये सच्चाई है, वह भी समझ में आवेगा। अस्तु, अस्तित्व नित्य वर्तमान है। सत्ता में संपृक्त प्रकृति में से चैतन्य प्रकृति ही जीवन है। जीवन में ही संचेतना प्रमाणित होती है। संचेतना का प्रमाण मानव में जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में है। यह प्रकारान्तर से हर व्यक्ति में प्रमाणित है। जीवन चैतन्य पद का वैभव है। संचेतना, यह जागृत जीवन सहज अभिव्यक्ति है। इसकी सार्थकता, पूर्णता के अर्थ में- जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित होती है। अस्तु, परार्थ व परमार्थिक विधि से क्रियापूर्णता (मानवीयता तथा देव मानवीयता) एवं आचरण पूर्णता पूर्वक जागृति पूर्णता को प्रमाणित करना, जागृत मानव परंपरा में, से, के लिए सहज संभव और आवश्यक है।
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