- 7. “सार्वभौम व्यवस्था व अखण्ड समाज, मानव सहज वैभव है।” मानव सहज कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु दश सोपानीय परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होता है। यह मौलिक विधान है।
- 8. “मानवीय लक्ष्य परम जागृति के रूप में सार्वभौम है।” मानवीयतापूर्ण अभिव्यक्ति, प्रकाशन सहज सम्प्रेषणाएँ, संपूर्ण आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्यों में समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व में अनुभव रूपी वैभव को प्रमाणित करता है। यह मौलिक विधान है।
- 9. “जागृत मानव बहुआयामी अभिव्यक्ति है।” मानव सहज परंपरा में अनुसंधान, अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन मानवीयता पूर्ण अध्ययन, शिक्षा व संस्कार, आचरण व व्यवहार, व्यवस्था, संस्कृति-सभ्यता और संविधान ही सहज प्रमाण है। यही मौलिक विधान है।
नित्यम् यातु शुभोदयम्!
2.3 परिभाषा खंड
1) अखण्ड समाज = जागृत मानव परंपरा
- 1) सहअस्तित्व में समाधान, समृद्धि, अभय सम्पन्न क्रिया व आचरण पूर्णता सहज परंपरा।
- 2) धार्मिक (सामाजिक), आर्थिक, राज्यनीतिक क्रिया अविभाज्य रूप में जागृत मानव परंपरा।
2) आयाम = प्रत्येक एक में चार आयाम - रूप, गुण, स्वभाव, धर्म।
मानव में चार आयाम – उत्पादन, व्यवहार, विचार, अनुभव।
3) काल = क्रिया की अवधि।
4) कोण (दृष्टिकोण) = जीव चेतना, मानव चेतना, देव चेतना, दिव्य चेतना के आधार पर दृष्टिकोण। निश्चित बिन्दु से अनंत कोण।
5) चरित्र
- 1) स्वधन, स्वनारी-स्वपुरुष, दयापूर्ण कार्य-व्यवहार।
- 2) स्वयं में विश्वास चरितार्थतापूर्वक, श्रेष्ठता का सम्मान करने चरितार्थतापूर्वक, प्रतिभा में विश्वास चरितार्थतापूर्वक, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन चरितार्थतापूर्वक, व्यवहार में सामाजिक रहते हुए व्यवसाय में स्वावलंबी रहने में चरितार्थतापूर्वक प्रमाण।
प्रतिभा = ज्ञान, विवेक, विज्ञान
व्यक्तित्व = मानवीयता, देव मानवीयता, दिव्य मानवीयता सहज रूप में।