को, प्रवाह को ग्रहण करते हुए देखने को मिलता है । यही पुनःश्च माध्यम के द्वारा दूर-दूर तक पहुँचता है ।

ऐसे विखंडन क्रम में क्या कोई वस्तु द्रव्य बना रहता है कि नहीं, इस मुद्दे पर यही स्पष्ट होता है कि हर अवकाश में कुछ न कुछ संख्या में अणु होते ही हैं । यही अणु चुम्बकीय धारा के प्रवाह क्षेत्र में होना भी स्पष्ट हो चुकी है । विखण्डन क्रम में, इस अवकाश में चुम्बकीय प्रवाह क्षेत्र में आये अणुओं में विद्युत धारा से प्रभावित होना भी स्वभाविक है । इसी के साथ साथ यह भी अनुमान होता है कि चुम्बकीय प्रभाव और विखण्डन दबाव के साथ इन अणुओं का परमाणु में विघटित होने, अथवा परमाणु विघटित होकर परमाणु अंश के रुप में दौड़ लगाने की भी सम्भावना बनी रहती है (विद्युत प्रवाह के साथ)। यद्यपि प्रवाह के साथ माध्यम पर होने वाला प्रभाव , उसके फलस्वरुप होने वाली क्रिया स्पष्ट होती है । माध्यम पर विद्युत प्रवाह प्रवाहित होते ही उनमें संकोचन प्रसारण बढ़ना हो ही जाता है । इसको हर जिज्ञासु अर्थात् प्रयोग पूर्वक समझने की इच्छा रखने वाला, परीक्षण निरीक्षण कर सकता है ।

जितने भी उपक्रम विद्युत प्रवाह के लिए बन चुके हैं, प्रवाहों को नियंत्रित करने, संयत करने, विभाजित करने, उपयोग करने, नापने और सुनिश्चित करने के जितने भी उपकरण बन चुके हैं, पर्याप्त लगते हैं । यदि आगे और कोई आवश्यकता होने की स्थिति में मानव में शोध अनुसंधान प्रवृत्ति है ही । इससे आपूर्ति होना संभावित है । इससे आश्वस्त होते हुए शाश्वत, निरंतर प्राप्त विद्युत निष्पादित यंत्रों को संचालित करने के लिए स्रोतों का अवश्यमेव प्रयोग करना ही हमारा सौभाग्य भविष्य होगा ।

आज तक पुरुषार्थी मानव से बैटरी के रूप में जो उपलब्धियाँ हुई हैं उसमें सेल वाली बैटरी और प्लेट वाली बैटरी है । पहले सेल वाली बैटरी में एक कार्बन प्लेट होना पाया जाता है उसके चारों ओर रसायन द्रव्य और जिंक या शीशा का कवच होना पाया जाता है । इसके अंदर जो रसायन द्रव्य रहता है, वह शीशा या जिंक के साथ क्रिया करते हुए अणु के रुप में आवेशित होकर अपने प्रभाव क्षेत्र में विद्युत प्रसारण किया करता है । यह प्रभाव क्षेत्र एक के साथ एक जुड़कर कार्बन के साथ जुड़े रहते हैं । इसीलिए इसमें विद्युत प्रवाह उपलब्ध हो पाता है । इस बैटरी से बल्ब जलते हुए देखते हैं ।

दूसरी विधि से प्लेट बैटरी में भी रसायन द्रव्य अम्ल लवण आदि द्रव्य होते ही हैं । अम्ल तो होते ही हैं । इनके संयोग में आये हुए धातुओं में क्रिया सम्पन्न होना स्वभाविक रहती है । इनमें

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