प्रत्येक व्यवहार के संतुलन का आधार न्याय है,जो पूर्ण है ।

प्रत्येक विचार के संतुलन का आधार समाधान है, जो पूर्ण है ।

प्रत्येक व्यक्ति में अनुभव का आधार सहअस्तित्व रूपी परम सत्य है, जो समग्र है ।

प्राकृतिक एवं मानव संतुलन एवं असंतुलन का प्रधान कारण मानव ही है, भ्रमित अवस्था में मानव कर्म करते समय स्वतंत्र एवं फल भोगते समय परतंत्र है । जागृत मानव कर्म करते समय तथा फल भोगते समय स्वतंत्र है । जागृत अवस्था में समझकर करने वाली परम्परा रहेगी तथा भ्रमित अवस्था में कर के समझने वाली परम्परा रहेगी । प्राकृतिक वैभव का विशेषकर मानव ही उपयोग करता है, जो प्रत्यक्ष है ।

ऋतु-संतुलन को बनाये रखने के लिये भूमि में आवश्यकीय मात्रा में खनिज वनस्पति (वन) को सुरक्षित रखते हुए उपयोग करना, साथ ही उसकी उत्पादन-प्रक्रिया में विध्न उत्पन्न नहीं करना और सहायक होना ही प्राकृतिक नियम का तात्पर्य है । यह पूर्णतः मानव का दायित्व है ।

वनस्पति (वन) एवं खनिज जिनकी उत्पत्ति की संभावना एवं क्रम स्पष्ट है उनका उन्हीं के अनुपात मे उपयोग करना उचित है, अन्यथा प्राकृतिक दुर्घटनाओं से ग्रसित होना स्वभाविक है ।

शिक्षा एवं व्यवस्था ही सामूहिक (सामाजिक) संतुलन को बनाये रखने का एक मात्र उपाय है ।

सामाजिक संतुलन स्वधन, स्वनारी/स्वपुरूष एवं दया पूर्ण कार्य व्यवहार परंपरा है । इसके विपरीत में पर नारी, परपुरूष, पर-धन एवं पर-पीड़ा से असंतुलन ही है, जो प्रत्यक्ष है।

व्यक्ति के विचार-संतुलन (बौद्धिक संतुलन) के मूल में आवश्यकीय एवं अनावश्यकीय मूल प्रवृत्तियों की सक्रियता पाई जाती है । मानव के आवश्यकीय मूल प्रवृत्ति के मूल में संस्कार समझदारी ही रहता है । अनावश्यकता के मूल में भ्रम (विवशताएं) दृष्टव्य हैं ।

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