जागृत परम्परा में मानवीयतापूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रम संस्कारों का ही प्रदर्शन है क्योंकि जागृत परम्परा में संस्कार विहीन मानव नहीं है । जबकि भ्रमित मानव परम्पराएं समुदायों के रूप में गण्य हैं । यही सम्पूर्ण समस्या का कारण है । समस्याएं संस्कार का प्रमाण नहीं है, क्योंकि सभी समस्याएं समाधानित होते ही हैं ।

चित्रण व विचार ही क्रमशः कला एवं उपादेयता को प्रकट करता है ।

विचार सुसंस्कार से सम्बद्ध रहना ही जागृति है ।

मानवीयतापूर्ण संस्कार ही सार्वभौम-संस्कृति का द्योतक है । इससे निम्न अर्थात् अमानवीय प्रवृत्तियों का सार्वभौम होना संभव ही नहीं है ।

सामाजिक नियमों के पालन से ही स्वस्थ सार्वभौम संस्कृति और सभ्यता का उदय होता है । फलतः समाज की अखण्डता एवं उसकी अक्षुण्णता सिद्ध होती है ।

मानव ही ऐसी इकाई है जो केवल अपनी ही सुख-सुविधा से संतृप्त नहीं है अपितु समझदारी पूर्ण व्यवहार एवं व्यवस्था से संतृप्त होता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति प्राप्त सुविधा की सुरक्षा एवं सदुपयोग चाहता है, जो अनिवार्य है । इस प्रकार मानव सामाजिक व न्यायिक इकाई सिद्ध हुआ है या सिद्ध होने के लिये बाध्य है ।

सामाजिकता, बौद्धिकता एवं भौतिकता का संयुक्त रूप है ।

बौद्धिक क्षमता के नियंत्रण में भौतिकता है क्योंकि विचार के अभाव में उत्पादन व व्यवहार सिद्ध नहीं होता है ।

प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ दृष्टियाँ भौतिक व्यवसाय तथा उसके उपयोग में प्रयुक्त हुई हैं जो जीव चेतना पूर्वक जीते हुए मानव में है । न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य दृष्टियाँ जागृत मानव परंपरा में व्यवहार तथा आचरण में निर्णायक सिद्ध हुई हैं ।

मानव जीव चेतना पूर्वक अनेक समस्याओं को पैदा करता है । मानव चेतना पूर्वक समाधान को प्रमाणित करता है ।

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