आवश्यकीय मूल प्रवृत्तियाँ क्रम से असंग्रह (समृद्धि), स्नेह, विद्या, सरलता एवं अभय (वर्तमान में विश्वास) के रूप में, अनावश्यकीय मूल प्रवृत्तियाँ सुविधा, संग्रह, द्वेष, अविद्या, अभिमान एवं भय के रूप में प्रत्यक्ष हैं ।
प्राकृतिक संतुलन, सामाजिक संतुलन एवं बौद्धिक संतुलन योग्य नियम ही आवश्यकीय नियम है । यही “नियम-त्रय” है ।
आवश्यकीय नियमों का ज्ञान व अनुसरण निर्णय उसके सदुपयोग से, सदुपयोग का निर्णय विकास एवं जागृति से, विकास एवं जागृति का निर्णय बौद्धिक, सामाजिक एवं प्राकृतिक नियमों के समझ व पालन से स्पष्ट होता है । मानव के लिए अपने विकास एवं जागृति क्रम श्रृंखला को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये आवश्यकीय नियमों का अनुसरण एक अनिवार्य प्रक्रिया है । यही मानव-जीवन, जागृति क्रम, जागृत जीवन के कार्यक्रम का प्रत्यक्ष रूप भी है ।
सांस्कृतिक मूल्यों का अवगाहन एवं निर्वहन व मूल्यांकन ही मानवकृत वातावरण है ।
मानव में समाहित संस्कार ही उसके स्वभाव को अभिव्यक्त करता है । सुसंस्कार-पूत पूर्वक मानव संस्कृति का उद्गम होता है । यह तब तक संस्कार पूत होता ही रहेगा जब तक वह पूर्ण न हो जाये ।
संस्कार पूर्णता का प्रत्यक्ष रूप मानवीयता, अतिमानवीयता पूर्ण स्वभाव ही है ।
सुसंस्कृति सम्पन्नता का प्रत्यक्ष रूप मानवीयतापूर्ण स्वभाव है ।
विकृत संस्कृति का प्रत्यक्ष रूप ही अमानवीयता है ।
सामाजिकता पूर्ण संस्कृति मानवीयता पूर्वक स्पष्ट होती है । ऐसी मानवीयता के पोषण के लिये ही संस्कृति, सभ्यता, विधि और व्यवस्था है ।
ये परस्पर पूरक हैं क्योंकि संस्कृति का पोषण सभ्यता, सभ्यता का पोषण विधि, विधि का पोषण व्यवस्था, व्यवस्था का पोषण संस्कृति करती है ।