इसके उत्तर में, इन तथ्यों को इस प्रकार समझा चुके हैं कि हर यथास्थिति, अवस्था और पद सोपानवत् एक से एक जुड़ी हुई है । जैसे पदार्थावस्था विकास क्रम में अनेक यथास्थितियों से होते हुए रूप, गुण, स्वभाव, धर्म को व्याख्यायित करना, छोटे से छोटे, बड़े से बड़े भौतिक वस्तु के लिए व्यवस्था सम्पन्न हो गया है । यथा आकार, आयतन, घन से रूप; सम, विषम, मध्यस्थ के रूप में गुण; संगठन-विघटन के रूप में स्वभाव और अस्तित्व रूप में धर्म को समझा चुके हैं । इससे पता चलता है, सिंधु के एक बिन्दु को परीक्षण करने मात्र से संपूर्ण सिंधु के पानी को हम समझ चुके होते हैं । अध्ययन विधि इसी प्रकार सार्थक हो पाता है ।

उक्त प्रकार से प्राणावस्था का भी अध्ययन यथा आकार, आयतन, घन से रूप; सम विषम मध्यस्थ के रूप में गुण; सारक मारक के रूप में स्वभाव और अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म होना समझा चुके हैं । इसके आगे जीवावस्था में जीवन और शरीर संयुक्त रूप होते हुए कुछ जीवों में यह प्रमाणित हुआ है । इसके स्पष्टीकरण में सप्त धातुओं से रचित शरीर, समृद्ध मेधस तंत्र और मानव के निर्देश संकेतों को ग्रहण करने की क्षमता संपन्न जीवों में जीवन का होना प्रमाणित होता है । ऐसे जीवों में जीवन में भी आकार, आयतन, घन होता है । शरीर में भी होता है । जीवन अति सूक्ष्मतम क्यों न हो । जीवन में भी गुण सम, विषम, मध्यस्थ प्रभावित रहता ही है । मानव में जीवन प्रधान रहता है । इसीलिए, शरीर का सम, विषम, मध्यस्थ गुण गौण हो जाता है । जीवों में स्वभाव, धर्म संयुक्त रूप में होता है । क्रूरता, अक्रूरता शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में स्पष्ट हो पाता है । जीने की आशा धर्म भी संयुक्त रूप में स्पष्ट होता है । सम्पूर्ण जीव वंशानुषंगीय विधि से व्याख्यायित है । इसी प्रकार आगे मानव का भी सम, विषम मध्यस्थ गुणों का स्पष्टीकरण हो पाता है । मानव में भी गुण सर्वाधिक मध्यस्थ के पक्ष में है जो स्वयं के वैभव के रूप में व्यक्त होता है । मानव जब तक भ्रमित रहता है, तब तक स्व का होना सर्वोपरि, अन्य को गौण मानता है । इसी प्रवृत्ति का प्रकटन द्रोह, विद्रोह, शोषण, युद्ध के रूप में सुदूर विगत से ही स्पष्ट होता आया है । इसमें भी स्व वैभव की ही स्वीकृति रहती है । स्व वैभव को शुभ माना रहता है । जागृति पूर्वक सर्व शुभ के साथ ही स्व वैभव के होने के तथ्य को समझ पाता है, भ्रमवश इससे अनभिज्ञ रहता है । जब इसमें निष्ठा हो जाती है, जागृत हो जाता है, तब विषम गुणों से मुक्त हो जाता है । जब तक विषम गुणों से मुक्त नहीं होता, तब तक कुंठा, निराशा, प्रताड़ना प्रभावशील रहता है । इसी को मानव परंपरा में दुख कहते हैं । जागृत मानव का गुण सदा-सदा मध्यस्थ होना पाया जाता है । इसका सार्वभौम स्वरूप जागृत परंपरा को बनाये रखना, सार्वभौम व्यवस्था को बनाये रखना, अध्ययनपूर्वक अखण्ड समाज सूत्र को प्रमाणित किये

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