अव्यवस्थित मानव ही अव्यवस्था के लिए प्रयत्न करता है यह भी बात अव्यवस्था के कारक तत्व के रूप में मानव को पहचाना जा सकता है।

इस प्रकार रचना-विरचनाएं अपने संपूर्णता के साथ ही वैभवित रहते हुए देखने को मिलता है।

जैसे सूरज विरल रूप में होते हुए भी नियंत्रित रहना पाया जाता है। इसी प्रकार अनेक ग्रह-गोल विरल रूप में नियंत्रित है, कुछ ग्रह-गोल ठोस रूप में नियंत्रित है और कुछ ग्रह-गोल ठोस रूप के बाद संपूर्ण रासायनिक क्रिया-प्रक्रिया सहित रचना-विरचना के रूप में वैभवित रहना पाया जाता है। ऐसी समृद्ध धरतियों में से यह धरती जिसमें मानव शरण लिया है साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत है।

अतएव अव्यवस्था के लिए कारक कोई इकाई अस्तित्व में देखने को मिला है, वह केवल भ्रमित मानव है। इस आशय से भी स्पष्ट होता है कि हर भ्रमित मानव ही जागृत होना एक आवश्यकता है। अ.श. (85-86)

“मानव सुख धर्मी है”

धर्म का तात्पर्य धारणा है। धारणा – जिससे जिसका विलगिकरण न हो, वही उसकी धारणा है। जैसे पदार्थ (मिट्टी, पत्थर) में अस्तित्व धर्म (होना) पाया जाता है. ‘होने’ से पदार्थ को अलग नही किया जा सकता है। प्राण (पेड़ - पौधे) से अस्तित्व सहित पुष्टि (वृद्धि), जीवों में अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा ( जैसे बाग, कुत्ते, भालू को जीने की आशा से अलग नही किया जा सकता)।

मानव धर्म, मानव की धारणा, प्रत्येक मानव में सुख, शांति, संतोष और आनन्द के अर्थ में नित्य वर्तमान होना पाया जाता है। किसी भी मानव का परीक्षण करने पर यह पाया जाता है कि सुख, शांति, संतोष, आनन्द के आशा अपेक्षा में ही संपूर्ण कार्यकलाप विन्यासों को करता है। परीक्षण क्रम में 5 ज्ञानेन्द्रियों (शब्द, स्पर्श, रूप, गंध) से जो कुछ भी पहचानता है, पहचानने के मूल में प्रवृत्ति है वह सुखापेक्षा ही दिखाई पड़ती है।

संपूर्ण मानव संपूर्ण प्रकार के अध्ययनों को सुखापेक्षा से ही किया रहता है।

प्रत्येक मानव से सम्पादित होने वाली संपूर्ण अभिव्यक्ति संप्रेषणा, प्रकाशनों का परीक्षण से भी सुख-शांति, संतोष, आनन्द सहज आशा आकांक्षा से ही व्यक्त होना पाया जाता है। अस्तित्व में नित्य वर्तमान प्रकाशन को सुख की अपेक्षा आकांक्षा से ही स्वीकारना चाहता है। यही सुख, शांति, संतोष, आनंद परंपरा में प्रमाणित होने की स्थिति में समाधान, समृद्धि, अभय, सह-अस्तित्व के रूप में मूल्यांकित हो जाता है। क.द. (29)

प्रत्येक मानव सहज रूप में समाधान को स्वीकारता है न कि समस्या को क्योंकि समाधान सुख के रूप में ही होना समझ में आता है। अस्तु मानव व्यवस्था में जीने, व्यवहृत होने के फलस्वरूप ही नित्य समाधान अक्षुण्ण (निरंतर) रहना पाया जाता है। क.द. (48)

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