अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन विधि से अस्तित्व तथा अस्तित्व में मानव का अध्ययन करने पर पाया जाता है:-
- अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है, व्यवस्था है।
- मानव जाति एक (शरीर रचना के आधार पर)
- सर्वमानव में मानवत्व समान (मानवीयता के आधार पर)
- सर्वमानव में शुभाकांक्षा समान (सहअस्तित्व के आधार पर)
- सर्वमानव में मानव धर्म समान (सुख के आधार पर)
- धरती एक अखंड राष्ट्र है (रचना के आधार पर)
- सर्व मानव में लक्ष्य समान ( जागृति के आधार पर)
समझदारी से समाधान। समाधान = सुख । ज.व. (100)
मानव मात्र शरीर कृत्यों से तृप्त नही है (आहार, निंद्रा, भय, मैथुन) । मानव में कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रता सहज प्रकटन है। मानव स्वयं अस्तित्व का ज्ञाता होना चाहता है। संबंधों में जीना चाहता है। प्रत्येक मानव सुखी होना चाहता है। मानव की मूल अवश्यता = सुख। मूल आवशक्यता = सुख = समाधान = समझदारी = ज्ञान। समझदारी ही समाधान है। समाधान स्वयं सुख है। इस प्रकार संवाद विधि से स्पष्ट होता है कि मानव सन 2000 तक जागृति क्रम में ही जिया। जागृति की अपेक्षा बनी रही और जागृति के प्रस्ताव के रूप में मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद मानव के समक्ष उपस्थित हुआ।
इससे यह स्पष्ट हो गया जीव संसार के सदृश्य मानव शरीर स्वस्थता के आधार पर जीने जाते है तो शरीर स्वस्थता का प्रयोग भोग और संघर्ष व युद्ध में ही होता है।
अधिकाधिक उत्पादन-कार्य भी भोग और युद्ध के लिए ही हो रहे है। यह सभी समुदाय गत मानव का स्वरूप है जबकि मानव सुखी होना चाहता है। युद्ध और भोग विधि से सुख और सुख की निरन्तरता नहीं हो पाई। इसीलिए मानव व्यवस्था में जीने में सफल नहीं हो पाया। सुखी होने के लिए समाधानित होना जरूरी है। समाधान के लिए समझदारी और व्यवस्था में जीने की तमन्ना और अभ्यास आवश्यक है। इस क्रम में हम परम्परा के रूप में व्यवस्था में जीते हुए समाधान समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्वक सुखी होना, पूरी परम्परा सुखी होना मानव व्यवस्था के आधार पर जीना संभव हो जाता है।
इसीलिए हम यह निर्णय कर सकते है मानव समझदारी पूर्वक ही सफल होता है। समझदारी मानवीयतापूर्ण शिक्षा-संस्कार पूर्वक सर्व सुलभ होना पाया जाता है।
इस विधि से हम इस बात पर निर्णय कर सकते है संवाद भी कर सकते है कि जीव संसार शरीर अपनी आहार पद्धति से विहार पद्धति से स्वस्थता को प्रमाणित करते है। मानव अपने आहार, विहार, व्यवहार पूर्वक सर्वतोमुखी समाधान