परस्परता में, दो ग्रह गोलो की परस्परता में, अनेक ग्रह गोलो की परस्परता में, आकाश गंगाओं की परस्परता में यही व्यापक वस्तु समझ में आती है।

व्यापक का मतलब सर्वत्र एक सी विद्यमानता है।

ऐसी व्यापक वस्तु अपने में पारगामी, पारदर्शी के वैभव सम्पन्न है, क्योंकि परस्परता में एक दूसरे को पहचानना संभव है ही। इसी प्रकार सभी इकाइयों में पारगामी होना हर वस्तु ऊर्जा सम्पन्न होना क्रियाशीलता के रूप में प्रमाणित है, इसीलिए व्यापक वस्तु का नाम साम्य ऊर्जा भी है, ऊर्जा सम्पन्नता का फलन है बल सम्पन्नता और क्रियाशीलता

अस्तित्व नित्य वर्तमान है

अस्तित्व:- सत्य में पूर्णतया इंगित होने, तृप्त होने, गतिशील होने और नित्य निश्चित होने के रूप में हम प्रत्येक मानव को अस्तित्व में, से, के लिए देख सकते हैं। अस्तित्व न घटता है, न बढ़ता है इसलिए अस्तित्व स्थिर है यह दिखाई पड़ता हैं। अस्तित्व नित्य वर्तमान है, इसीलिए, अस्तित्व निरंतर स्थिर है यह दिखाई पड़ता हैं। अस्तित्व स्वयं किसी के लिए बाधा नहीं हैं और अस्तित्व पर किसी की बाधा अथवा हस्तक्षेप भी नहीं हैं। अस्तित्व निरंतर सामरस्य है, समाधान है, इसीलिए अस्तित्व ही परम सत्य है।

सत्ता:- अस्तित्व में सत्ता व्यापक रूप में हर किसी को दिखती हैं। दिखने का मतलब समझ में आने से हैं। अस्तु, प्रत्येक मानव में, से, के लिए सत्ता व्यापक रूप में विद्यमान है। यह दिखता है। जैसे एक दूसरे के बीच में जो कुछ भी शून्य दिखाई पड़ता है वह मूलत: व्यापक सत्ता ही है। भौतिक -रासायनिक वस्तुएँ और जीवन जैसी वस्तु (वास्तविकता) सत्ता में संपृक्त है। इसीलिए प्रत्येक एक सत्ता में घिरा और डूबा हुआ दिखाई पड़ता हैं ऐसा दिखने के आधार पर ही एक दूसरे की दूरी की कल्पना मानव करता हैं और दिखाई पड़ता है।

जैसे सूर्य से धरती की दूरी दिखती हैं। यह धरती तथा ऐसे ही प्रत्येक धरती सत्ता में डूबा, घिरा और भीगा हुआ है। डूबा, घिरा दिखना स्वयं एक दूसरे के बीच में जो वस्तु है- इसी को देखना हुआ, यही सत्ता है। यही व्यापक वस्तु है।

रासायनिक, भौतिक वस्तुएँ ठोस, तरल और विरल रुपों में विद्यमान हैं। विरल अवस्था में भी प्रत्येक अणु अथवा सम्मिलित एक से अधिक अणु “एक” के रूप में ख्यात हैं। इसी भांति परमाणु में निहित अंशों में, उन अंशों को यदि विखण्डित किया जाये तो प्रत्येक खंड “एक” ही कहलाएगा। यह क्रिया व्यवहार रूप में तो होती नहीं तथापि मानव की कल्पना सहज वैभव को गणित के रूप में पहचाना गया है।

गणित विधि से मूलत: मानव की कल्पनाशीलता विधि से, विखंडन की परिकल्पना है। इस विधि से भी, परमाणु में निहित एक अंश को, अनेकानेक खंडों में विभक्त करने के पश्चात भी प्रत्येक खंड “एक” ही कहलाता है।

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