यही मुख्य रूप में रचना-विरचना के रूप में देखने की विधि है। इसे सम्पूर्ण, व्यक्ति देखता ही है या देख सकता है। रचना-विरचना स्वयं इस बात का द्योतक है। कोई रचना अमर नहीं है जबकि वह रचना मूल में जिस वस्तु, पदार्थ से बना है (परमाणु) वे वस्तु के रूप में बने रहते है। अस्तु, मूल वस्तु का नाश होता है। परमाणु जिन अंशों से बने है, यह अब सदा सदा बने ही रहते हैं। वस्तु का परिवर्तन नहीं होता। यह ध्वनि अपने आप से निष्पन्न होती है।

यह स्मरण में रखने योग्य तथ्य है कि सम्पूर्ण रचना-विरचनाएँ, किन्हीं ग्रह-गोल पर ही होना पाया जाता है।

ऐसा सभी ग्रह-गोल जिस पर रचनाएँ होते है वह सदा-सदा ही पदार्थ, प्राण, जीव और ज्ञानावस्था मानव से संपन्न होना पाया जाता है। इस धरती पर इसका साक्ष्य सम्पन्न हो चुका है। विचारने और निष्कर्ष पाने का बिन्दु है कि यह धरती भी एक रचना है और इस धरती में सम्पूर्ण रचनाएँ है। जैसे पहले चारों अवस्थाएँ कही गई है। इस धरती में जीता जागता चारों अवस्थाएँ विद्यमान है। इन चारों में ये अर्थ दृश्यमान होते हुए धरती विरचित होते हुए देखने को नहीं मिलता है और इन चारों अवस्थाओं के होते धरती अपने दृढ़ता को बनाए रखता हुआ मानव को देखने को मिला है।

इससे यह पता चलता है और प्रमाणित होता है कि भौतिक-रासायनिक रचना-विरचनाएँ धरती के ऊपरी सतह पर होते हुए धरती अपने वैभव को बनाए रखने में क्षमता सम्पन्न है। दूसरे क्रम में यह धरती अपने आप में व्यवस्था होते हुए समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता हुआ दृष्टव्य है।

जैसा यह धरती अपने चारों अवस्था सहित एक व्यवस्था के रूप में है ही इसी के साथ-साथ एक सौर व्यूह में भागीदारी निर्वाह करता है। यह भी हर जागृत मानव को स्पष्ट रूप में ज्ञात है। हर सौर व्यूह अनेक सौर व्यूहों के साथ व्यवस्था में भागीदारी को निर्वाह करने के क्रम में अनन्त सौर व्यूह, अनन्त ग्रह-गोल मानव सहज कल्पना में आता ही है। असंख्य रूप में अर्थात् मानव गिन नहीं सकता है इतना संख्या में ग्रह गोल असीम ऊर्जा में आकाश में दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार यह धरती अपने में चारों अवस्थाओं से समृद्ध होना स्पष्ट है और मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में इस धरती पर है। शरीर परंपरा स्थापित हो चुकी है। जीवन अस्तित्व में है ही। स.श. (63-65)

1.2 अस्तित्व में चार अवस्था

अस्तित्व में चार अवस्था - पदार्थ, प्राण, जीव, ज्ञानावस्था (मानव)

जो जैसा है वह उसकी वास्तविकता है। इस प्रकार अस्तित्व में निम्नलिखित वस्तुएँ हैं -

व्यापक रूप में नित्य वर्तमान “सत्ता” एक अखण्ड वस्तु है क्योंकि इसकी वास्तविकता, पारदर्शीयता, पारगामीयता, व्यापकता द़ृष्टव्य है। पारदर्शिता का तात्पर्य प्रकृति व्यापक वस्तु में प्रकाशमान है, प्रतिबिबित है, परस्परता में पहचानता है, निर्वाह करता है। परगामीयता का तात्पर्य प्रकृति होने और न होने से स्थली में वर्तमान। व्यापक वस्तु, जड़ चैतन्य प्रकृति में ‘पारगामी’ है, प्रकृति के ‘आर पार’ है।

Page 29 of 130
25 26 27 28 29 30 31 32 33