इस प्रकार किसी का तिरोभाव (नाश) नहीं हो सकता। इस सत्य के खिलाफ मानव की कल्पनाशीलता प्रादुर्भाव और तिरोभाव (नाश) के चक्कर में पड़कर अथवा भ्रम में ग्रसित होकर परेशान ही हुई है। अस्तित्व में कोई ऐसी चीज नहीं है, जो पैदा होती हो अथवा जो हैं वह मिट जाता हो; यह दोनों क्रियाएँ अस्तित्व में नहीं हैं। इसी भ्रमपूर्ण कल्पनावश मानव परेशान रहा हैं। इससे यह भी समझ में आता है कि “जो था, वही होता है; जैसे अस्तित्व में पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था थी”।

इसकी गवाही इस धरती पर स्पष्ट हैं। इसका द़ृष्टा मानव ही हैं। इस ज्वलंत उदाहरण से “जो था वही होता है, और जो था नहीं वह होता नहीं।”

इस मुद्दे पर बुद्घिजीवी अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं। इस धरती के पहले किस धरती पर ये चारों अवस्थायें कहाँ थी, यह पूछ सकते हैं। इसमें दो दोष ऐसा आता है - देश और काल। अस्तित्व सहज वैभव में अर्थात् अस्तित्व सहज नित्य वर्तमान रुपी वैभव में देश और काल हस्तक्षेप नहीं कर पाते। जैसे किसी देश स्थान में चारों अवस्था रहते ही हैं। काल- हर समय हर वर्तमान में रहता ही है।

अस्तित्व नित्य वर्तमान है। भूत और भविष्य क्रिया के रचना, विरचना गति के साथ है।

वर्तमान की अक्षुण्णता को अथवा निरंतरता को किसी और विधि से प्रयोग करना संभव नहीं हैं। जो कुछ भी विधियाँ हैं, वे सब अस्तित्व सहज है। उन सबकी निरंतरता है। किसी भी एक और विधि को देश, काल में सीमित नहीं किया जा सकता। जब कभी भी कोई बात सीमित होती हैं, वह निषेध ही है। अद्भुत बात यह है कि अस्तित्व में निषेध नहीं है। निषेध का स्थान नहीं है, निषेध का गति नहीं हैं, निषेध का स्थिति नहीं है। भ व (96-101)

अस्तित्व का नाश नही है

अस्तित्व ही व्यापक, अनन्त, अमर, रचना-विरचना के रूप में वर्तमान है। रचना विरचनाएँ परिणामों के रूप में विद्यमान है ही। रचना की अवधि में जो द्रव्य वस्तुएँ दिखाई पड़ती है, विरचना के अनन्तर भी उतने ही वस्तु अस्तित्व में होते ही है। जैसे इस पत्थर को कूट-कूटकर अनन्त टुकड़े में बाँटने के उपरान्त भी मूलतः पत्थर के रूप में जितने भी द्रव्य वस्तुएँ है, वे सब पत्थर के रूप में पाया जाता है। इसी प्रकार एक झाड़ अपने रचना रूप में जितने द्रव्य वस्तुओं से वैभवित रहता है उसे अनेक रूप में बांटने के उपरान्त भी यथा उसको कूट-पीसकर, सुखाकर, जला करके और कुछ भी करके देखने के उपरान्त भी तरल, विरल, ठोस के रूप में अथवा विरल और ठोस के रूप में सभी पदार्थ यथावत् विद्यमान रहते हैं।

तीसरे विधि से एक जीव, एक मानव शरीर रचना में कितने भी द्रव्य और वस्तुएँ समाहित, संयोजित और वैभवित रहते हैं, उसे जलाने, गलाने, कुछ भी विधि से अनेक, अनंत टुकड़े में बांटने के उपरान्त रचना के दौरान जितने द्रव्य वस्तुएँ रहती हैं वे सब उतने ही रहते हैं।

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