- सत्ता में संपृक्त जड़ व चैतन्य-प्रकृति, वस्तुओं (वास्तविकता) के रूप में नित्य वर्तमान है।
- सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य-प्रकृति में से जड़-प्रकृति रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना में कार्यरत नित्य वर्तमान है। जो पदार्थावस्था और प्राणावस्था के रूप में गण्य है। पदार्थावस्था का स्वरुप और कार्य विभिन्न प्रकार के परमाणु और उनसे बनी रचनाऐं हैं। प्राणावस्था का प्रधान स्वरुप और कार्य प्राणकोषा और ऐसी कोषाओं से रचित रचनाऐं हैं। प्राणावस्था सभी अन्न, वनस्पतियों, जीव शरीरों और मानव शरीरों के रूप में द़ृष्टव्य है।
- सत्ता में सम्पृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति में से चैतन्य-प्रकृति “गठनर्पूण परमाणु” है। जिसका परिणाम के अमरत्व सहित, “जीवन पद” में संक्रमित रहना पाया जाता है। ( गठन पूर्ण परमाणु = जीवन परमाणु = चैतन्य = ऐसा परमाणु, जिसमें अंशों की संख्या का घटना बढ़ना संभव नहीं है = ‘तृप्त परमाणु’ )
वक्तव्य:-
- अध्ययन करने की संपूर्ण वस्तु सह-अस्तित्व ही है।
- अध्ययन करने वाली वस्तु मानव है।
- प्रत्येक मानव जड़-चैतन्य-प्रकृति के संयुक्त साकार रूप में है। चैतन्य-प्रकृति का नाम जीवन है। जड़-प्रकृति का नाम शरीर है।
अस्तित्व एवं अस्तित्व में परमाणु का विकास
अस्तित्व को अनादि काल से मानव स्पष्ट और प्रमाण रूप में समझने का प्रयास करता रहा है। इसी क्रम में अधिभौतिकवादी विचारों के अनुसार चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति होती हैं ऐसा माना जाता है। भौतिकवादी विचारों के अनुसार पदार्थ से चेतना निष्पन्न होती है। ये दोनों विचारधारायें अपने-अपने समर्थन के लिए अनेकानेक तर्कों, अभ्यासों और प्रयोगों को प्रस्तावित करते रहे। अभी तक न तो किसी ने चेतना से पदार्थ को पैदा होते हुए देखा तथा न ही पदार्थ से चेतना पैदा होते हुए देखने को मिला। यही देखने को मिलता हैं कि चेतना व पदार्थ अविभाज्य वर्तमान है।
इसके मूल रूप को देखने से पता चलता हैं कि सत्ता (चेतना) में सम्पृक्त प्रकृति (पदार्थ) ही अस्तित्व सर्वस्व है। यहाँ देखने का तात्पर्य समझने से है।
व्यापक सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति (जड़ एवं चैतन्य) अविभाज्य वर्तमान होने के कारण अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व के रूप में नित्य प्रकाशित है। इस तथ्य को हृदयंगम (समझना, स्वीकारना) करने पर स्पष्ट हो जाता हैं कि चेतना और पदार्थ में नित्य सामरस्यता त्रिकालाबाध (तीनों काल – बूट, भविष्य, वर्तमान) सत्य है। सत्ता अरूप हैं, व्यापक है और सत्ता में प्रकृति अविभाज्य है। ऐसा कोई स्थान ही नहीं जहाँ सत्ता न हो, इसलिए प्रकृति का सत्ता में होना स्वाभाविक है।