सत्ता को साम्य ऊर्जा, शून्य, ज्ञान, चेतना, व्यापक, नित्य, ईश्वर और निरपेक्ष ऊर्जा के नाम से भी जाना जाता है।

सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अनन्त इकाईयों के रूप में है। प्रत्येक इकाई सत्ता में सम्पृक्त होने के कारण सत्ता में घिरी हुई, डूबी हुई और भीगी हुई है। सत्ता व्यापक रूपी किसी लंबाई चौड़ाई में सीमित नहीं है, इसका कोई मापदण्ड नहीं बन पाता, इसलिए सत्ता “व्यापक” है। प्रकृति रूप में जितनी भी इकाईयाँ है उन सबकी गणना नहीं हो पाती इसलिए वे अनंत हैं इस प्रकार अस्तित्व स्वयं व्यापक और अनन्त है। सत्ता ‘अरूपात्मक’ और सत्ता में प्रकृत्ति ‘रूपात्मक’ अस्तित्व है। अस्तित्व का तात्पर्य “होने” से और “अविनाशिता” से है। सत्ता गति और दबाव विहीन स्थिति में है। जबकि सत्ता में ही सम्पूर्ण प्रकृति गति और दबाव सहित विद्यमान है।

दबाव अर्थात् वातावरणवश (परस्परतावश) आकर्षण विकर्षण के लिए बाध्यता। सत्ता अरूपात्मक होने के कारण आयामों में सीमित नहीं हैं जबकि सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति अनन्त इकाईयों का समूह है। साथ ही प्रत्येक इकाई आयामों सहित छ: ओर से सीमित है।

अस्तित्व सह-अस्तित्व होने के कारण पूरकता और पहचान नित्य सिद्घ होती है। जो है, वह निरंतर रहता ही हैं और जो था नहीं वह होता नहीं। इसी कारणवश अस्तित्व जैसा है, वह अनन्त काल तक वैसा रहेगा ही। इसी सत्यतावश सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति की प्रत्येक इकाई अस्तित्व में परस्परता को पहचानने के रूप में व्यवहृत है, क्योंकि प्रत्येक इकाई में रूप, गुण, स्वभाव और धर्म अविभाज्य वर्तमान है।

सत्ता में प्रकृति सम्पृक्त होने के कारण प्रत्येक इकाई अस्तित्व धर्म सहित होता है, इसका साक्षी ही है किसी इकाई का नाश न होना। जो कुछ भी होता हैं वह केवल परिवर्तन और विकास ही है। प्रत्येक इकाई के चार आयाम है, जिसे आगे चर्चा किया जाएगया। धर्म का तात्पर्य जिससे जिसका विलगीकरण न हो। अस्तित्व स्वयं सह-अस्तित्व होने के कारण यही परम धर्म का रूप है। परम धर्म (अस्तित्व) प्रत्येक इकाई में अभाव है, इसलिए यह सार्वभौम और शाश्वत है।

रूपात्मक अस्तित्व :-

प्रकृति की मूल इकाई परमाणु है। क्योंकि परमाणु में ही विकास होता है। (विकास क्रम= परमाणु अंशों को गठन गठन संख्या में वृद्धि, परिवर्तन; परमाणु में विकास = तृप्त परमाणु = गठनपूर्ण परमाणु = चैतन्य इकाई = जीवन)। परमाणु में प्रत्येक परमाणु गठनपूर्वक परमाणु हैं। प्रत्येक गठन में एक से अधिक परमाणु अंशों का होना अनिवार्य है। परमाणु के पूर्व रूप (परमाणुअंश) में विकास होता नहीं है। परमाणु के पररुप (अणु) रचनाएँ विकास की लाक्षणिकता को प्रकाशित करते हैं, परन्तु विकास नहीं होता है, क्योंकि विकसित इकाई अर्थात् जीवन शरीर रचना के माध्यम से प्रकाशित और सम्प्रेषित होता है।

विकास के क्रम में ही प्रकृति दो वर्ग व चार अवस्थाओं में प्रकाशमान है। प्रकृति के दो वर्ग जड़ और चैतन्य है। प्रकृति की चार अवस्थाएँ पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था है।

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