“द़ृष्टा पद” में होने का प्रमाण जीवन और शरीर संयुक्त रूप में सिद्घ होता हैं। “दृष्टा पद” – मानव ही अस्तित्व को तथा स्वयं को जानता है, स्वयं तथा अस्तित्व का दृष्टा, अर्थात् देखने वा रहता है। समझने के क्रम में ही अज्ञात को ज्ञात एवम् अप्राप्त को प्राप्त करने के कार्यकलापों को मानव ही सहज रूप में संपन्न किया करता हैं।
द़ृश्य के रूप में अस्तित्व ही नित्य वर्तमान हैं। अस्तित्व में चारों अवस्थाएँ अपने में एक अनुपम अभिव्यक्ति हैं।
जीवों का कार्यकलाप उन के प्रजाति वंश के अनुसार निश्चित कार्य रूप में रहता हैं। यही संतुलन का तात्पर्य है। मानव अस्तित्व में द़ृष्टा पद में होते हुए भी अभी तक मानव का कार्यकलाप अनिश्चित है। मानव शरीर भी अवयवों के संतुलित रूप में ही प्रकाशित हैं। इस प्रकार प्राण कोषाओं से सभी वनस्पतियाँ जीव और मानव शरीर की रचनाएँ होते हुए समझ में आती हैं। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में जीने वाले जीव एवम् मानव शरीर में ‘सप्त धातुएँ ’ देखने को मिलती हैं। सप्त धातुओं के सर्वोच्च संतुलित रचना मानव शरीर ही हैं।
स्वेदज (जैसे कीड़े मकोड़े, जोंक) व असमृद्घ मेधस युक्त रचनाओं को जीवन चलाता नहीं हैं अथवा वे चलाने योग्य नहीं होतें। उनमें सप्त धातुएँ देखने को नहीं मिलती हैं। वे रचनाएँ प्राण कोषाओं से ही रचित रहती हैं।
झाड़ व पौधे सभी प्राण कोषाओं की ही रचना होते हुए इनमें सप्त धातु नहीं होते। इन्हीं सब प्रमाणों के साथ जीवन और शरीर का संयोग उसी शरीर से संयोगित हो पाता हैं, जिस शरीर की संरचना में सप्त धातुएँ अंग अवयवों के संतुलन के अर्थ से रचित रहते हैं तथा समृद्घ मेधस व समृद्घिपूर्ण मेधस की रचना संपन्न होती हैं। ऐसे ही शरीर को जीवन संचालित करता हुआ देखने को मिलता हैं। इस क्रम में जो भी प्राण कोषाएँ देखने को मिलती है, वे सब विधिवत् रासायनिक वैभव के रूप में दिखते हैं। इसके साथ कृत्रिमता नहीं हो पाती। जो कुछ भी कृत्रिमता (मानवकृत) का आकार दे पाना मानव से बन जाता हैं वह सब पदार्थावस्था सहज वस्तुओं के रूप में ही देखने को मिलता हैं।
रासायनिक क्रिया प्राकृतिक ही होती हैं, कृत्रिम होती नहीं हैं इसलिए प्राण कोषाएँ प्राकृतिक ही होती हैं, कृत्रिम नहीं होती है। प्राण कोषाओं से रचित रचनायें स्वाभाविक रूप में प्राकृतिक है, कृत्रिम नहीं।
प्रकृति का तात्पर्य - पहले से ही क्रिया के रूप में रहता हैं। इसी का नाम प्रकृति है। पहले से जो क्रिया और वस्तु, गति और स्थिति रहते आया, वैसी क्रिया को घटाना (घटित करना) प्राकृतिक ही हुआ। मनुष्य प्रकृति सहज कई घटनाओं को स्वयं भी घटा सकता है। इसलिए इसे कृत्रिमता का नाम देना चाहते हैं। वह इसलिए सार्थक नहीं हो पाता है कि वह पहले से ही बना रहता है। ऐसा अभी प्राण कोषाओं के सम्बन्ध में कहा जा चुका है। इसी के साथ जीवन (चैतन्य) को कृत्रिम प्रक्रिया से घटित किया नहीं जा सकता।
जीवन जब कभी भी घटित होगा, वह परमाणु ही गठनपूर्णता पूर्वक ही प्रमाणित हो पाता है।
परमाणु में गठन एक प्रकृति सहज प्रक्रिया है। ऐसे गठन में पूर्णता का होना उसी परमाणु में निश्चित क्रिया का परिणाम घटना है। इसलिए मनुष्य द्वारा जीवन को घटाना (याने जीवन बनाना) संभव नहीं है और आवश्यक भी नहीं है। इसी