प्रत्येक इकाई का स्वयं में व्यवस्था होने का आचरण, वर्तमान में अक्षुण्णता (निरन्तरता) के रूप में देखने को मिलता हैं, जैसे लोहे का परमाणु-अणु “लौहत्व” के साथ वर्तमानित रहना पाया जाता हैं। इसकी अक्षुण्णता (निरन्तरता) प्रमाणित है। एक प्राण कोषा और उनसे रचित रचना अपने-अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हैं। ऐसी प्राण कोषाएँ रचना सूत्र संपन्न रहते हैं। विधिवत् रचना के लिए निश्चित सूत्र रहते ही हैं। प्राण कोषा में ही उस-उस प्रजाति के अनंत प्राण कोषाओं में भी, प्राण सूत्र के आधार पर ही रचनाएँ निश्चित होना पाया जाता हैं। यही “त्व” सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का साक्ष्य हैं।

प्राण सूत्र सहित प्रत्येक कोषा अपने “त्व” सहित व्यवस्था रुपी कोषा हैं।

फलस्वरुप किसी एक रचना रुपी सम्मिलित प्रकाशन समग्रता है। ऐसी समग्रता में प्रत्येक प्राण कोषा का भागीदार होना स्पष्ट हैं। इसलिए प्रत्येक प्राण कोषा समग्र व्यवस्था में भागीदार है। प्राण कोषा अपने में व्यवस्था होने के स्वरुप में बीज-वृक्ष नियम सम्पन्न रहता है। यही प्राण कोषाओं में “त्व” सहित व्यवस्था का प्रमाण है। वनस्पति, जीव और मनुष्य शरीर के साथ यही रचना सूत्र सम्पन्न होते हैं।

प्राण सूत्र विधि से, बीज-वृक्ष नियम विधि (बीज के आधार पर वृक्ष की रचना, वृक्ष से पुनः आवर्तनशीलता) से प्राणावस्था की सभी रचनाएँ स्पष्ट हैं।

प्रत्येक रचना अपने में एक सम्पूर्ण रचना होते हुए अनेकानेक रचनाओं के साथ सह-अस्तित्वशील (पूरक) रहना देखने को मिलता हैं। जैसे आम, नीम आदि अनेक प्रजाति के वृक्ष, पौधे-लता आदि सभी एक दूसरे के साथ, बीज-वृक्ष नियम सहित निश्चित आकार व आचरण को प्रकाशित करते हुए देखने को मिलता हैं। इसी क्रम में जीवावस्था, समृद्घ मेधस युक्त शरीर और जीवन का संयुक्त साकार रूप होते हुए भी जीवन, शरीर को तादात्म्य विधि (स्वयं को शरीर मना रहता है) से स्वीकारा रहता हैं।

इसका सूत्र हैं – जीवन (चैतन्य इकाई) , शरीर को जीवन्त बनाये रखते हुए शरीर को ही अपना जीने की स्थली स्वरुप स्वीकारता है।

इसलिए जीवन शक्तियाँ उन-उन शरीर रचना को अनुरुप बह पाती है। इसी यथार्थता के आधार पर अनेकानेक प्रजाति के जीवों का वर्तमान होना स्पष्ट है। ये सब वर्तमान में ही हैं। प्रत्येक प्रजाति के जीव अपने ढंग से, अपनी परंपरा को बनाये रखते हुए देखने को मिलता हैं। प्रत्येक जीव अपने में व्यवस्था होने के कारण अपनी प्रजाति के जीव कोटि के साथ सम्मिलित होता हैं। इसी के साथ किसी एक प्रजाति के जीव अनेकानेक प्रजाति के जीव के साथ जीता हुआ भी देखने को मिलता हैं।

इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि एक प्रजाति की सम्पूर्ण वनस्पतियाँ अन्य प्रजाति की वनस्पतियों के साथ वर्तमान होना देखने को मिला। और एक प्रजाति के जीवों का दूसरी प्रजाति के जीवों के साथ जीना देखने को मिला।

ये सभी क्रियाकलाप स्वाभाविक रूप में नियम, नियंत्रण, संतुलन विधियों (नियम = निश्चित आचरण। नियंत्रण = आचरण की निरन्तरता, जैसे पेड़ के पत्ते की बाद होने की एक सीमा है। संतुलन = उपयोगिता, पूरकता, जैसे जीवों

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