में शाकाहार- मांसाहार में संतुलन, निश्चित अनुपात है।) से संपन्न होते आए। पदार्थावस्था में परिणाम क्रियाकलाप रुपी परंपरा में नियंत्रित रहना स्वाभाविक वर्तमान हैं। प्राणावस्था में संपूर्ण रचनाएँ बीजानुषंगीय विधि (बीज के अनुसार चलना) से नियंत्रित रहना तथा संतुलित रहना प्रमाणित है, पीपल की पत्ती, झाड़ तथा जड़, उसी प्रकार अन्य झाड़ पौधे-लता आदि का अपने-अपने तरीके के पत्र-पुष्प, फल, बीज तथा जड़ होना पाया जाता हैं। ये सब रचना कार्य में नियंत्रण का द्योतक हैं।

नियंत्रण में नियम समाया रहता हैं, क्योंकि नियम पूर्वक ही रासायनिक योग और वैभव होना पाया जाता हैं।

प्रत्येक रासायनिक प्रक्रिया में, एक से अधिक प्रजाति के अणुओं का संयोग होना देखा गया है। ये अणु निश्चित मात्रा व नियम से ही संयोगों में आते हैं। फलत: रासायनिक वैभव स्पष्ट होता हैं। मूलत: पदार्थावस्था में परमाणु व अणु नियमित रहना पाया जाता हैं। प्राणावस्था में इस नियम के आधार पर ही नियंत्रण प्रकाशित हुआ। यह नियंत्रण बीज से वृक्ष तथा वृक्ष से बीज तक आवर्तनशीलता के रूप में स्पष्ट हो गया है। अस्तित्व में ऐसी कोई चीज नहीं है जो नियंत्रित न हो अथवा नियमित न हो।

इसलिए नियमित रहना और नियंत्रित रहना अणु-परमाणु की स्थितियों में भी देखने को मिलता हैं। यही नियम-नियंत्रण के रूप में प्राणावस्था की रचनाओं में आवर्तनशील विधि से स्पष्ट हो गया है।

प्राणावस्था में रचनाएँ नियंत्रण की साक्षी हैं। जबकि जीवावस्था और ज्ञानावस्था की शरीर रचनाओं में अंग अवयवों का संतुलन आवश्यक रहता ही है। इसलिए जीव शरीरों और मानव शरीर की रचनाओं में नियंत्रण और नियम समाहित रहता ही हैं। इस क्रम में प्रत्येक एक का अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में वैभवित होना पाया जाता है। जीवावस्था और ज्ञानावस्था की शरीर रचनाएँ वंशानुगत विधि से सफलता का प्रकाशन करती हैं। वंशों की महत्वपूर्ण भूमिका आकारों और ज्ञानेन्द्रियों-कर्मेन्द्रिय कार्यों के आधार पर निश्चित होना पाया जाता हैं।

आकार, आयतन कार्य के तालमेल के लिए उस-उसके अंग-अवयवों की रचना निश्चित अनुपाती होना पाया जाता है। इनका कार्य संतुलन, जीवन सहज आशा, मेधस क्रिया के आधार पर संपन्न होना पाया जाता हैं।

प्रत्येक जीव का आचरण अपने-अपने शरीर सहज रूप में व्याख्यायित रहता हैं। ऐसी व्याख्या के आधार पर ही प्रत्येक प्रजाति के जीव अपनी मौलिकता (मूल्य) की व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के अर्थ में सार्थक बनते हुए देखने को मिलता है। जीवों में प्रत्येक अंग-अवयवों का अपना-अपना आकार वंश की प्रधान पहचान है। (जैसे बाघ का शरीर वंश के अनुसार, घोड़े का शरीर रचना उसके वंश के अनुसार)। इस पहचान के साथ उसका कार्य जीवन के संयोग से ही संपन्न होता हुआ समझ में आता हैं।

जीवन, जीव शरीरों में, आशा का प्रसारण करता हुआ देखने को मिलता हैं। प्रत्येक जीव जीने की आशा से ही जीता हुआ मिलता हैं।

ज्ञानावस्था सहज मानव जीवन में आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाण जैसे शक्तियों का क्रियाकलाप समझने को मिलता हैं। इसे समझने वाला भी मानव ही हैं। इस शक्तियों की चर्चा आगे अध्यायों में किया गया है। मानव के

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