हो सकता है। इसके बाद इससे लगा पुन: प्रश्न होता है कैसे हो सकता है ? इसके उत्तर में साफ-साफ मानव ही विश्लेषण की वस्तु के रूप में दिखाई पड़ती है। हर मानव में संतुष्ष्टि स्वीकृत है, असंतुष्टि स्वीकृत नहीं हैं। संतुष्टि पाने के लिए ही मानव परंपरा में अर्पित रहता है भले ही वह छोटा सा समुदाय क्यों न हो ?

अभी तक मानव कुल विविध समुदाय में ही गण्य हो पाया है। इसीलिए हर मानव जन्म से मानव कुल में ही अर्थात् समुदाय में अर्पित होना दृष्टव्य है।

मानव शरीर ही जीवन जागृति को व्यक्त करने योग्य रचना है। ऐसी शरीर रचना की परंपरा स्थापित है। हर समुदाय में भी ऐसे ही शरीर रचना होने के व्यवस्था बन चुकी है। मानव शरीर रचना में मुख्य अंग मेधस रचना ही है। मेधस रचना के साथ ही कार्यतंत्रणा और ज्ञान तंत्रणा विधि निहित है, जीवन ही इन तंत्रणा विधियों से ज्ञान तंत्रणा पूर्वक कर्म तंत्रणा सम्पन्न करता है। ज्ञान तंत्रणा को हम ज्ञानेन्द्रियों में पहचान सकते हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ शब्द स्पर्श, रूप, रस, गंधात्मक साक्ष्यों सहित प्रमाणित है। इन्हीं क्रियाओं के साथ ही मानव को जीवंत रहना प्रमाणित होता है। इन क्रियाओं के लुप्त होने के उपरान्त ही मरणासन्न या मृत हो जाता है। इसमें मुख्य तथ्य यही है मेधस से जीवन में जुड़ी हुई ज्ञान तंत्रणा जब तक बनी रहती है अथवा सम्पादित हो पाती है तब तक शरीर यात्रा की सार्थकता मूल्यांकित होती है।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन शक्तियाँ ज्ञान तंत्रणा पूर्वक परावर्तित होते हैं। यही परावर्तन व्यवहार, उत्पादन और उपयोग क्रियाकलापों में साक्षित होता है। अ.श. (100-102)

जीवन के भुलावेवश ही अथवा जीवन विद्या का भुलावा अथवा अज्ञात रह जाना ही शरीर को जीवन समझने की विवशता है। तभी हम सोचने के लिए बाध्य हो जाते है शरीर में होने वाली क्रिया (निंद्रा) को जीवन का सोना (निद्रा) मान लेते है। जबकि ऐसा होता नहीं है। इसका साक्ष्य है कि जड़-चैतन्यात्मक कोई परमाणु निष्क्रिय नहीं होता अर्थात् सतत क्रियारत रहता है। चैतन्य क्रिया शरीर की अक्षमता को जानकर इसे चलाने और दौड़ाने की प्रेरणा की अक्षयता स्वभाव सिद्घ होते हुए शरीर द्वारा जितना कार्य कराना हैं अथवा शरीर जितना कार्य करने योग्य हैं उतना ही कराता है। इस प्रकार शरीर का सो जाना जीवन का सो जाना नहीं हुआ।

शरीर के लिए आहार, निद्रा आदि क्रियाओं का प्रयोजन सिद्घ होता हैं।

जीवन के लिए मूल्य और मूल्यांकन ही व्यवहारिक प्रयोजन सिद्घ होता है। शरीर निर्वाह ही जीवन तृप्ति नहीं है। जीवन की अनुग्रह बुद्घि (स्वीकृति) से ही शरीर निर्वाह की व्यवस्था हो पाती हैं। अस्तु, हम इस निष्कर्ष पर आते हैं कि शरीर जीवन नहीं है, जीवन शरीर नहीं है। जीवन नित्य हैं, जीवन के लिए शरीर एक साधन है और माध्यम है। भ. व.(90-92)

मानव में जागृति की प्यास, आवश्यकता प्रकारांतर से बनी ही है। यह प्रकारांतर से हर मानव में निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण से इंगित होता है। शिशु काल से ही न्याय की अपेक्षा, सही कार्य-व्यवहार करने की इच्छा, सत्य बोलने की प्रवृत्तियाँ देखने को मिलता है। परंपरा का ही दमखम है अथवा गरिमा है कि इन आशाओं को सार्थक बना देना। अभी तक यह पूरा हो नही पाया।

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