जीवन सोता नहीं है, अपितु सतता कार्यरत रहता ही है। जीवन सहज अक्षय-कार्य में से आंशिक कार्य ही शरीर के द्वारा प्रमाणित हो पाता है।

जीवन जागृत होने के उपरांत भी जागृत-स्वप्न-सुसुप्ति (निंद्रा) अवस्थाओं में शरीर को जीवंत बनाए रखते हुए शरीर के दृष्टा पद में (देखने में) कार्यरत रहता ही है। इसमें जागृति के अनंतर शरीर को जीवन समझने वाला भ्रम दूर होता है। शरीर व्यवहार और अस्तित्व में दृष्टा पद स्वयं अनुभव सहज वैभव है। दृष्टापद ही पूर्णता का द्योतक यही परंपरा से प्रमाण है। पूर्णता के अनंतर उसकी निरंतरता होना ही प्रमाण, महिमा है। इस विधि से मानव परंपरा जागृत होने के उपरांत ही मानव कुल में भाग लेने वाले हर जीवन का अपेक्षा जो शैशवकाल में ही सर्वेक्षित हो पाता है, उसका भरपाई नित्य वैभव के रूप में सम्पन्न होना पाया जाता है।

इससे हम यह निष्कर्ष को पाते हैं कि शिशुकालीन अपेक्षाएँ, शोध-कार्य प्रवृत्ति कार्यप्रणाली के शोध के लिए प्रेरक होता है।

दूसरा, मानव कुल में व्याप्त कुण्ठा यथा द्रोह-विद्रोह-शोषण और युद्ध साथ ही द्वेष से ग्रसित परिवार, समुदाय अपने त्रासदी जागृति महिमावश भ्रम मुक्ति और शोध प्रवृत्ति की आवश्यकता को इंगित करता है। तीसरा, यह धरती का शक्ल-सूरत ही बदल जाना, पर्यावरण में प्रदूषण अपने पराकाष्ठा तक पहुँचना पुन: प्रचलित सूझबूझ के स्थान पर जिससे यह घटनाएँ हुईं विकल्पात्मक सूझबूझ के शोध की आवश्यकता को स्पष्ट करता है। अ.श. (124-126)

जीवन क्रियाकलाप,क्रिया

जीवन प्रत्येक मानव में, समान रूप में विद्यमान होने के सत्य में जागृति आवश्यक है। जीवन के क्रियाकलाप का पहला स्वरुप:-

कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता है।

  • जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करने की क्रिया है।
  • उपरोक्त के स्वरूप में प्रत्येक जीवन में 10 क्रियाएँ है :- पाँच प्रत्यावर्तन (स्थिति) में, पाँच परावर्तन (गति) में। समझना प्रत्यावर्तन है, व्यक्त करना परावर्तन है। आस्वादन – तुलन – चिंतन – बोध – अनुभव यह प्रत्यावर्तन (स्थिति) में, चयन – विश्लेषण – चित्रण – संकल्प – प्रामाणिकता यह परावर्तन(गति) में।

आस्वादन और चयन रूपी दो क्रिया मन में है।

  • तुलन और विश्लेषण रूपी दो क्रिया वृत्ति में है।
  • चिन्तन और चित्रण रूपी दो क्रिया चित्त में है।
  • बोध और ऋतम्भरा रूपी दो क्रिया बुद्धि में है।
  • अनुभव और प्रामाणिकता रूपी दो क्रिया आत्मा में है।
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