(1) कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता के आधार पर ही मानव ने अपनी आशा, विचार, इच्छा के अनुरुप सामान्य आकांक्षा (आहार-आवास-अलंकार), महत्वाकांक्षा (दुरगमन-दूरश्रवण-दूरदर्शन) संबंधी वस्तुओं और उपकरणों को तैयार कर लिया हैं। इसी के आधार पर निर्भर रहकर अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था साकार नहीं हो पाई। इसलिए मानव सहज विभूतियों को समझना और मानव आकांक्षा सहज अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था को साकार करने के उद्देश्य से मानव का संपूर्ण अध्ययन करना आवश्यक है।

प्रत्येक मानव चाहे बालक हो,वृद्ध हो, अमीर हो, गरीब हो, किसी भी देश, जाति, धर्म को मानने वाला हो, में कल्पनाशीलता की महिमा दिखाई देता है। यह जीवन सहज महिमा है, न कि शरीर गत।

इसी क्रम में, कर्म स्वतंत्रता वश मानव ने अनेक यंत्र, उपकरणों को बना डाला। आज तक मानव जो भी सोचा है, पहचाना है, समझा है, किया है इसी कल्पनाशीलता -कर्मस्वतंत्रता की महिमा है। कल्पनाशीलता अक्षय है। हम कितना भी कल्पना करें और करने के लिए शेष बचा ही रहता है। भ.व.(305-315)

(2) जानना मानना पहचानना निर्वाह करना :- अस्तित्व में पहचानने का क्रिया - स्वरूप ही निर्वाह करने के अर्थ को प्रमाणित कर देता है। मानवेत्तर प्रकृति में पहचानने - निर्वाह करने की प्रक्रिया विधि नित्य वर्तमान है। इसका प्रमाण पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था में देखने को मिलता है। जैसे एक परमाणु दूसरे परमाणु को पहचानता है, तभी अणु रूप में बन पाता है। यह अपने में निर्वाह करने का प्रमाण है। इसी विधि से अणु से अणु रचित पिंड, रचनाएँ, सभी पहचानने निर्वाह करने का प्रमाण है। प्राणावस्था के पौधे पेड़ पौधे मिट्टी को पहचानते हैं तथा निर्वाह करते हैं। जीव अपने आधार को पहचानता है, निर्वाह करता है।

मानने की क्रिया, जीवों तथा मानव में ही देखने को मिलता है।

जैसे गाय अपने निश्चित स्थान को पहचानता है। बाग मानव के संकेतों को स्वीकार कर उसके अनुसार चलता है। यदि कुत्ता, घोड़ा में भी देख सकते हैं। मानव में मानने की क्रिया है ही। मानव अपने को किसी देश, जाति, धर्म, पंथ का मानता ही है। न्याय को मानता है, सत्य को मानता है। यह सब कल्पनाशीलता का ही प्रकाशन है। जानने-मानने का जो मौलिक स्थित है,गति है, वह केवल मानव में ही होना पाया जाता है (यह जागृत विधि से आता है)।

अस्तित्व में ‘जो कुछ’ भी है यह ‘सब कुछ’ को मानव मानना जानना चाहता है। जाने का फलन मानने के रूप में आता है। मानने का स्वरूप है – “यह सत्य है इसे स्वीकारना है। मानव में जानने के आधार पर ही मानना- पहचानना- निर्वाह करना सार्थक होना पाया जाता है। किसी के अस्तित्व को बिना जाने मान मान लेना ही मान्यता का स्वरूप है। ऐसी मान्यता में अधिमुल्यन, अवमूल्यन, निर्मुल्यन दोष रहता ही है, यही भ्रम है।“

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