न्याय, धर्म, सत्य की सर्वमानव में अपेक्षा, स्वीकृति
- न्याय सबको चाहिए, धर्म अर्थात सार्वभौम व्यवस्था अखंड समाज होना चाहिए, सत्य समझ में आना चाहिए क्योंकि यह जीवन सहज स्वीकृति होने के कारण इन्हें बिना समझे भी जीवन स्वीकारा ही रहता है इसीलिए यह सबके लिए आवश्यक है।
- प्रिय-हित-लाभ क्रियाकलापों में व्यस्त रहते हुए भी न्याय-धर्म-सत्य की स्वीकृति, अपेक्षा, कल्पना करता हुआ मानव को देखा गया है। अ. व. (105,189)
- भ्रमित मानव में भी न्याय, धर्म, सत्य की स्वीकृति बनी हुई है किंतु इसी के साथ परंपरा में इसकी प्रमाणिकता की उपलब्धि नहीं रहने के कारण मानव अपने तरीके से जीने के स्वरूप को बना लेता है। ज. व.(संस-2002) पृ (108)
- मानव संबंध, प्रकृति संबंध का सार्थक, अवांछनीय जैसे विचार, स्वीकृति और आशा के रूप में स्वीकृतियाँ मानव में रहती ही हैं। स. श. (35)
जीवन क्रियाएँ अविभाज्य है
जीवन शक्तियों को किसी भी घर में, घाट में, तिजोरी में, बैंक में, अधिकोषों में, राज कोषों में, विश्वकोषों में जमा नहीं किया जा सकता। इसी तथ्य के आधार पर बौद्धिक आरक्षण की निरर्थकता समझ में आती है। क्योंकि जीवन शक्ति और बल सतत ही अक्षय है। यह नित्य स्थिति और गति सम्पन्न है। स्थिति में बल, गति में शक्ति अथवा गति को शक्ति कहा जाता है। स्थिति गति का अविभाज्यता जीवन में चरितार्थ होना पाया जाता है। ऐसी शक्तियों को, बलों को जीवन ही जीवन से, जीवन के लिए जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना संभव है।
जीवन ज्ञान (जीवन को समझना, स्वयं का ज्ञान) के साथ अस्तित्व दर्शन (सम्पूर्ण अस्तित्व को समझना), मानवीयता पूर्ण आचरण (मानव संबंध, नैसर्गिक संबंध, मानवत्व, भागीदारी समझना) समाहित रहता है।
जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखता है। जीवन क्रियाएँ अविभाज्य क्रिया है। जीवन एक चैतन्य परमाणु, भार बंधन और अणु बंधन से मुक्त इकाई के रूप में होना पाया जाता है। ऐसे परमाणु में चतुर्थ परिवेशीय अशों का नाम है मन, क्रिया है चयन और आस्वादन या वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा यह भी नाम ही है, इस के साथ ही कार्यरत रहना पाया जाता है, इसलिए मन को जीवन में अविभाज्य कार्य बताया गया। जीवन ही शरीर को जीवंत बनाये रखता है। म.व. (110)