को नहीं मिलता हैं क्योंकि न्याय संहिता व न्यायालयों में फैसला करते हैं, न्याय नहीं। यह स्वाभाविक रूप में मानववादी चिंतन क्रम में द़ृष्टिगोचर होता हैं।

तुलन की 6 दृष्टियाँ :-

प्रिय - इंद्रियाँ सापेक्ष

  • हित - स्वास्थ्य सापेक्ष
  • लाभ - वस्तु/सेवा सापेक्ष
  • न्याय - संबंध / व्यवहार सापेक्ष
  • धर्म - व्यवस्था / समाधान सापेक्ष
  • सत्य - अस्तित्व सापेक्ष
  • आस्वादन - रूचि मूलक, मूल्य मूलक अथवा लक्ष्य मूलक विधि से होता है।
  • प्रिय - सर्वाधिक रूचि मूलक होना पाया जाता है।
  • हित - जीवन शरीर को स्वस्थ रखना।
  • लाभ - काम दे कर ज्यादा लेना । अ. श (12)
  • रूचियों में सुख भासता है। फलस्वरूप उसकी निरंतरता की आशा, आवश्यकता का उदय होता है। इसी तथ्यवश सुख की, निरंतरता के लिए प्रयासोदय का जीवन जागृति विधि से ही स्फूर्ति होना पाया जाता है। सुख की निरंतरता के लिए अनेक प्रकार से प्रयास करना, स्पष्ट है। जैसे प्रत्येक मानव, प्रत्येक कार्य को, सुख की अपेक्षा में करता है। इसका प्रमाण स्पष्ट है कि सभी प्रकार की आशाएं सुखापेक्षा में हैं। म्. वि. (99)

चिंतन - चित्रण (इच्छा) -

प्रत्येक मानव चित्रण कार्य करता ही है। जैसे हम- मानचित्रों में एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए सड़क को मन में बना लेते हैं। इसमें रेल रास्ता, सड़क इत्यादि बना लेते हैं। प्रत्येक चित्रण में रूप और गुण समाया रहना सहज है। पांच ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से प्राप्त सारा संकेत चित्त्त में चित्रण रूपी स्मरण में पहचाना जा सकता है। (चित्रण (स्मरण) को प्राप्त करने की विधि को इच्छा कहां है।)

भ्रमित मानव (जीव चेतना) में सारा आशा, विचार, इच्छाएं प्रिय-हित -लाभ दृष्टि द्वारा इंद्रियां सन्निकर्ष विधि से शरीर मुल्क होना पाया जाता है। फलतः अतृप्ति है। अध्ययन विधि से साक्षात्कार होता है, अनुभव पूर्वक चिंतन होता है। अ. श. (12), संवाद (२००९)

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