चिंतन – चित्त में ही चित्रण कार्य सम्पन्न होता है। इसके पहले चयन और आस्वादन, विश्लेषण और तुलन क्रियाओं को, प्रत्येक भ्रमित मानव में इन्द्रिय सन्निकर्ष पूर्वक संपन्न होना स्पष्ट किया जा चुका है। यही कुल भ्रमित जीवन में होने वाली साढ़े चार (4½) क्रिया है। चिंतन में ही प्रयोजनों को अनुभव रूप में पहचाना जाता हैं। चिंतन विधि से न्याय के प्रयोजन को मनुष्य पहचानता हैं, जीवन पहचानता हैं। न्याय धर्म सत्य ही जीवन सहज प्रयोजन है, इसी का साक्षात्कार होता है (अध्ययन विधि में चिंतन को साक्षात्कार कहा है) ।
न्याय धर्म सत्य दृष्टियां के संयोग से ही साक्षात्कार होना पाया जाता है। साक्षात्कार रूप गुण स्वभाव धर्म के संयुक्त रूप में होता है । न्याय धर्म सत्य – यह साक्षात्कार होता है । (संवाद, २०१०)
बोध - संकल्प (ऋतंभरा) -
बोध जो कुछ भी होता है, न्याय- धर्म- सत्य का ही होता है। वह अपने में जानना मानना ही है। जानने मानने का संतुलन का नाम है बोध । यह निश्चयात्मक स्वीकृति ही है । स्वभाव धर्म का बोध होता है (संवाद, २०१०)
अनुभव - प्रामाणिकता (प्रमाण) -
जानने-मानने का तृप्ति बिंदु अनुभव है। सत्य सहज पूर्ण स्वीकृति अनुभव है।
इस विधि से भ्रमित अवस्था में साढें चार क्रिया (चयन, आस्वादन, आशा, तुलन (मात्र प्रिय, हित, लाभ), विश्लेषण और चित्रण) तथा जागृत स्थिति में 10 क्रियाएं जीवन में व्यक्त होना पाया जाता है। स्थिति में बल, गति में शक्ति है। प्रत्यावर्तन क्रिया का नाम बल है। (जैसे आस्वादन क्रिया का नाम मन, तुलन क्रिया का नाम वृत्ति, चिंतन क्रिया का नाम चित्त। परावर्तन क्रिया का नाम शक्ति है। जैसे चयन - आशा, विश्लेषण - विचार, चित्रण - इच्छा।
इस ढंग से 5 बल, 5 शक्ति के रूप में 5 प्रत्यावर्तन क्रिया, 5 परावर्तन क्रिया जीवन में अविभाज्य रूप में पाया जाता है। यह 10 क्रिया जागृति पूर्वक ही सफल (व्यक्त) है। भ. व। (318), संवाद(2008)
अनुभवमूलक विधि से ही प्रमाणिकता का बोध-संकल्प, प्रमाणिकता का चिंतन-चित्रण न्याय, धर्म, सत्य सहज तुलन, विश्लेषण, मानवीय मूल्यों का आस्वादन और चयन सहित जीवन क्रिया प्रणाली और शैली स्थापित होना ही जागृति परंपरा का, जागृत मानव का प्रमाण है। यह भी सर्वविदित है, जागृत मानव ही जागृत परंपरा का संस्थापक, धारक- वाहक होना सहज है। इस प्रकार जागृति शैली का तात्पर्य अभिव्यक्ति, संप्रेषणों, कार्य-व्यवहार के रूप में स्पष्ट होना ही जागृत परंपरा के नाम से इंगित आशय है। अ. व. (200)