जीवन- मेधस- शरीर
जीव शरीरों, मानव शरीरों में, डिम्ब शुक्र संयोग के आधार पर भ्रूण एवं भ्रूण के आधार पर संपूर्ण अंग अवयवों की रचना विधि देखने को मिलती हैं। इसकी रचना स्थली गर्भाशय में व्यवस्थित है। ऐसी शरीर रचना में मेधस रचना (ब्रेन) भी एक प्रधान भाग है। मानव शरीर रचना में ही समृद्घ पूर्ण मेधस रचना पाई जाती हैं। हृदय आदि सभी प्रधान अंग-अवयवों सहित शरीर की संपूर्ण मौलिकता, श्वसन क्रिया करना ही उपलब्धि हैं।
मूल प्राण कोषा में भी श्वसन क्रिया ही मौलिक पहचान का आधार रहा हैं। उसी प्रकार मानव शरीर रचना के उपरान्त भी उतनी ही मौलिकता देखी गई।
ऐसे (समृद्ध मेधस युक्त शरीर) शरीर को चलाने वाला जीवन ही होता हैं। जो आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा एवं प्रमाण के रूप में ही शरीर संचालन में प्रमाणित होता हैं। ऐसा जीवन शरीर को, जीवंतता प्रदान किये रखता हैं। आशा आदि के अनुरुप इंद्रियाँ संचालित हो पाती हैं। इस विधि से, शरीर और जीवन को संयुक्त रूप में होना सहज रहा है। जीवन, अपने अनुसार, जागृति क्रम में जागृति पूर्णता को व्यक्त करने के लिए मानव शरीर को संचालित करता हैं। यह परंपरा में प्रमाणित है। भ.व. (276)
संकरीकरण (नस्ल मिश्रण) विधि से मानव में कुछ लोग नस्ल परिवर्तन को मानते हैं। उनका सोचना है कि नस्ल के आधार पर अच्छा-बुरा आदमी होता हैं जबकि मूलत: मानव शरीर और जीवन का संयुक्त साकार रूप हैं, इस कारण काले-गोरे, मोटे-पतले, ऊँचे-ठिगने सभी प्रकार के मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में ही नियंत्रित है। मानव में जो कुछ भी परितर्वन होना या जागृति होना हैं वह, जीवन में ही होना है। जीवन में परिवर्तन होने का साक्ष्य समझदारी है। जीवन में ही समझदारी और संस्कार समाया रहता है। जीवन, शरीर के द्वारा प्रमाणित होता है। ऊपर कहे सभी प्रकार के मानवों में जीवन समान प्रकार में व्यक्त होना सहज हैं।
क्योंकि हर प्रकार के आदमी गणित को समझते हैं, समझा है। शरीर शास्त्र को समझता है, वनस्पति शास्त्र को समझता हैं, जो समझदारी एक प्रजाति के व्यक्ति को हो पाया हैं, वह सभी प्रजाति के व्यक्तियों में होना पाया गया है।
इस समझदारी से प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति समझदारी सहज अधिकार के रूप में समान दिखाई पड़ते हैं। यही मानव जाति में मौलिक तत्व हैं, इसी के आधार पर मानव की एकता, अखण्डता सहज सूत्र समााहित हैं। मानव के शरीर रचना की विविधता के आधार पर एकता और अखण्डता की कल्पना भी होना संभव नहीं है। इसलिए जीवन में समानता के आधार पर मानव सहज एकता स्पष्ट हो जाता है। जबकि नस्ल के बदलने से अथवा शरीर के आकार-प्रकार के बदलने मात्र से मानव की एकता, अखण्डता नहीं बन पाती। भ. व. (292-293)