2.3 जीवन में भ्रम, जागृति
भ्रम- भय, प्रलोभन, आस्था – जीव चेतना
अस्तित्व नित्य वर्तमान है, जागृत मानव द़ृष्टा पद में है; यह परम सत्य हैं, इस पर आधारित एक नजरिया है। इस नजरिए से विगत को, इतिहास के ढंग से देखने पर पता चलता है कि सभी परम्पराएँ अपने-अपने समुदाय अथवा व्यक्ति के लिए अनेकानेक छल, बल, सम्मोहन, प्रलोभन करती रही और इससे परेशानियाँ बढ़ाता रहा। इसका मूल कारण इतना ही है कि भ्रमित मानव समुदाय परंपरा में अपने ढंग से भ्रमित रहकर भ्रमित परंपरा बनाने के लिए जीवन की शक्तियों को लगाते रहे।
आदिकाल से ही मानव जीवन और शरीर का संयुक्त साकार रूप हैं, जीव चेतनावश भय प्रलोभन रूप में जीवन शक्तियाँ पहले भी काम करती रही हैं, अभी भी काम कर रही हैं। इस आधार पर वर्तमान में भ्रम-निर्भ्रम संबंधी परीक्षण करने जाते हैं तब पता चलता है कि :-
- मानव सर्वप्रथम कल्पनाओं को भ्रमवश सत्य मानता रहा है।
- भ्रमित विचारों के आधार पर सत्य मान लेता है।
- भ्रमित इच्छाओं के आधार पर सत्य मान लेता है।
- सत्य बोध के आधार पर सह-अस्तित्व समझ में आता है।
- सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य में अनुभव के आधार पर सत्य समझता है, प्रमाणित रहता है। भ. व. (138 -139)
भ्रम का तात्पर्य ही होता है – अधिमूल्यन (जो जैसा है उससे अधिक मानना), अवमूल्यन (जो जैसा है उससे कम मानना), र्निमूल्यन(जो जैसा है उसे नहीं देख पाना, अथवा अन्यथा मान लेना)। जैसे मानव को समझने के क्रम में र्निमूल्यन, प्रतीक मुद्राओं (पैसे) का अधिमूल्यन, उपयोगिता मूल्य का अवमूल्यन किया गया एवम् मानव को समझने के मूल में जीव कोटि का मानते हुए झेल लिया। यही निर्मूल्यन होने के फलस्वरूप भ्रम के शिकंजे में कसता ही गया।
नैसर्गिकता का अवमूल्यन - मानवेत्तर जीव कोटि वन खनिज के मूल्यों का नासमझी वश दुरुपयोग किया। वन और खनिज के दुरुपयोगिता क्रम में धरती का अवमूल्यन हुआ।
मानव जब वैज्ञानिक युग में आया तब से धरती में निहित वन-खनिज संसार पर आक्रमण तेजी से बढ़ाया। उन-उन समय में इसको उपलब्धियाँ मान ली गई। इसके परिणाम में आज की स्थिति में परिवर्तन पाते हैं अथवा दुष्परिणामों को पाते हैं। दूषित हवा, पानी, धरती, अनाज, धरती का वातावरण और दूषित इरादे। लाभोन्मादी, भोगान्मादी, कामोन्मादी शिक्षा तंत्र, प्रचार तंत्र और गति माध्यम का दुरुपयोग, ये सब साक्ष्य भ्रमित मानव मानस के उपक्रम के रूप में हम पाते हैं। भ्रम-निर्भ्रमता को आंकलित करना, जीव चेतना एवं मानव चेतना के आधार पर है।
जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान में पारंगत होने के उपरांत ही तुलनात्मक (भ्रम- निर्भ्रम का) समझ संभव होना पाया गया। अ.श. (111-113)