इस वर्तमान में अर्थात बीसवीं सदी की दसवीं दशक में सर्वाधिक मानव भ्रांतिपद (भ्रमित स्थिति) में होते हुए ज्ञानावस्था में है। अर्थात ज्ञान समृद्ध होने के लिए उम्मीदवार के रूप में है इसलिए जागृति क्रम में होना स्वीकार होता है। सर्व मानव ही ज्ञानावस्था की इकाई के रूप में वर्तमान है। अजागृत अर्थात् भ्रमित व्यक्ति में भी जागृति की आवश्यकता बनी ही रहती है। म.वि. (167- 170)

मेरे अनुसार लोकमानस जागृति के पक्ष में है जागृति का मतलब जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना ही है। भ्रमित स्थिति में केवल मानने के आधार पर पहचानना निर्वाह करना होता है, जानना शेष रहता है। मानव परम्परा में अभी छ: सात सौ करोड़ की जनसंख्या बतायी जाती है। इन सात सौ करोड़ आदमियों मे से कोई ऐसा मेरी नजर में नहीं आता है जो जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने से मुकरे। जानने, मानने के उपरान्त पहचानना निर्वाह करना स्वाभाविक होता है। जानना मानना नहीं होने पर भी मानव में (मानने के आधार पर मान्यतावश) पहचानना निर्वाह करना होता ही है।

न जानते हुए पहचानने के लिए प्रयत्न संवेदनशीलता के साथ ही हो पाता है। मानव परम्परा में संवेदनाओ (संवेदना = शरीर संबंधी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध इंद्रियों को राजी करना) का आधार झगड़े की जड़ बन चुकी है।

हर मानव आवेशित न रहते हुए स्थिति में झगड़े के पक्ष में नहीं होता है जब आवेशित रहता है तभी झगड़े के पक्ष में होता है। आवेशित होना भय और प्रलोभन के आधार पर ही होता है। सारे प्रलोभन संवेदनाओं के पक्ष में है सारे भय भी संवेदनाओ के आधार पर ही है। इसलिए समझदारीपूर्वक व्यवस्था में भागीदारी के आधार पर मानव लक्ष्य को सार्थक बनाने के कार्यक्रम में क्रियाशील रहना, निष्ठान्वित रहना ही समाधान परम्परा का आधार है।

समाधान अपने आप में न भय है न प्रलोभन है निरन्तर सुख का स्रोत है। यही संज्ञानशीलता (ज्ञान, समझ = संज्ञानशीलता) का प्रमाण है। यही मानवीयता पूर्ण शिक्षा संस्कार का फलन है। ज.व. (180-181)

जबकि वर्तमान में जीवन सहज कार्यकलाप के अनुसार आशा, विचार, इच्छा के साथ-साथ प्रिय-हित-लाभ रूपी नजरिया क्रियाशील रहना भ्रमित मानव का प्रकाशन है भ्रमित अवस्था की यही लम्बाई-चौड़ाई है। इन्हीं के विस्तार वांग्मय के साथ-साथ भय और प्रलोभन का पुट देते हुए वांग्मयों का निर्माण होता रहा है। ऐसे वांग्मयों को (भय और प्रलोभनवादी परिकथाओं-कथाओं) बड़े सम्मान से लोक श्रवण स्वीकारता हुआ देखा गया।

इससे स्पष्ट हो जाता है भय और प्रलोभन से चलकर आस्था तक पहुँचना जागृति क्रम में एक मंजिल मान लिया गया।

आस्थावाद से ही अधिकाधिक आश्वासन, भय से राहत पाने का आश्वासन बना रहा है। कड़ी के रूप में इन सबको सीढ़ी-दर-सीढ़ी में होना देखा गया है। यह अंतिम मंजिल नहीं है यह भी देखा गया है। इसी क्रम में अर्थशास्त्र को भी विचार रूप में लाभ को एक आवश्यकीय तत्व मानते हुए ही प्रस्तुत किया गया।

संग्रह का तृप्ति बिन्दु न होने के कारण सबको संग्रह सुलभ होना संभव नहीं हुआ। क्योंकि यह धरती सीमित है। वस्तुएं दो प्रकार से बंट गईं। वस्तु और प्रतीक वस्तु, और प्रतीक वस्तु का प्रतीक वस्तु। जैसे सम्पूर्ण वस्तुओं का एक प्रतीक वस्तु सोना, सोना का प्रतीक वस्तु पत्र मुद्रा देखा गया। अ.श. (107-108)

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