न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि की क्रियाशीलता
साक्षात्कार- बोध-अनुभव : जागृति, मानव चेतना
भ्रम का सम्पूर्ण स्वरूप आशा, विचार, इच्छा (चित्रण) का प्रिय, हित, लाभात्मक दृष्टियों की क्रियाशीलता ही है। भय, प्रलोभनात्मक प्रणाली में व्यवस्था की परिकल्पना मानव को स्वार्थी, अज्ञानी, पापी, गलती और अपराध करने वाला है; ऐसा मानते हुए सम्पूर्ण योजनाओं को स्थापित करना ये भ्रमात्मक कार्यकलापों का विस्तार है। यही परम्परा के रूप में अनुवर्ती होने की प्रेरणा देना जिसमें से स्वार्थ, पाप, अज्ञान मुक्ति धर्मगद्दियों के कार्यक्रम के रूप में और गलती को गलती से रोकना, अपराध को अपराध से रोकना और युद्ध को युद्ध से रोकना यह राजगद्दियों के कार्यक्रम के रूप में दृष्टव्य है।
धर्मगद्दियों से मोक्ष और बंधन की चर्चा हरेक पीढ़ी सुनते ही आया है। मोक्ष सर्वोपरि अथवा परम उपलब्धि अथवा परम घटना के रूप में बताते हैं। इसे बताते समय में भले ही विभिन्नता हो, हर धर्मगद्दियाँ मोक्ष को सर्वोपरि प्रतिपादित करते हैं।
इसी के साथ-साथ स्वर्ग-नर्क की परिकल्पना भी मानव मानस में समाहित कर चुके हैं। इस मुद्दे पर बन्धन का स्वरूप अध्ययनगम्य होने की विधि से जीवन क्रियाकलापों में भ्रमवश पीड़ित होना ही है। जीवन में ही जागृति की सम्भावना नित्य समीचीन रहता ही है। मौलिक तथ्य यही है हर मानव जागृति पूर्वक ही समाधानित होना देखा गया। ऐसा जागृति बिन्दुएँ -
- अस्तित्व में जागृत होने के रूप में और यह सर्वसुलभ होने के रूप में देखा गया। इसीलिये यह अनुभवात्मक अध्यात्मवाद अध्ययनगम्य होने की विधि से प्रस्तुत किया गया है।
- अनुभव (जानने मनाने की तृप्ति बिन्दु) जीवन में ही, जीवन से ही, जीवन के लिये ही समीचीन है। जैसा-मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में है एवम् शरीर को जीवन संचालित करता है यह दोनों तथ्य स्पष्ट हो चुकी है। जीवन ही भ्रमित अवस्था में भ्रमित रहकर बन्धन के पीड़ाओं से पीड़ित होता है। शरीर और संसार के साथ इन्द्रिय सन्निकर्ष और कल्पनापूर्वक समस्त प्रकार के अव्यवस्था का पीड़ा होना अथवा अव्यवस्था के समझ के अनुपात में पीड़ित होना देखा गया। इस तथ्य को हर मानव अपने में निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक पहचानना सहज है।
सर्वमानव पीड़ा से मुक्ति चाहता ही है। यही जागृति सहज अपेक्षा का स्रोत और सम्भावना है। जीवन सहज क्रियाकलापों में, से न्याय, धर्म, सत्य का साक्षात्कार और दृष्टा होना और उसका प्रमाण सिद्ध होना ही सम्पूर्ण जागृति है। दृष्टापद में होने वाली सम्पूर्ण क्रियाकलाप जीवन सहज विधि से जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने के रूप में होना पाया गया है। जानने-मानने की सम्पूर्ण वस्तु जीवन ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है।