लाभ का और संग्रह का कहीं तृप्ति बिन्दु ही न होना सबको विदित है। इस विधि से उद्योग में भागीदारी करने वाले निरंतर व्यथित रहना, असंतुष्ट रहना ही हाथ लग पाता है। इस बीच भय और प्रलोभन के आधार पर ही उद्योग व्यवस्था को सफल बनाने का प्रयत्न प्रौद्योगिकी के आरंभ काल से ही जुड़ा हुआ देखा गया। अ.श. (157-160 )
जबकि परिवार मूलक, स्वराज्य गति सहित स्वानुशासन संपन्न होना ही मानव पंरपरा का सहज लक्ष्य है। इसी क्रम में मानव का मानवीयतापूर्ण विधि से स्वयं में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी संपन्न होना सहज हैं। ऐसी सहजता किसी भी समुदाय परंपरा में, से सुलभ नहीं हो पाई। तथापि हर देश, हर समुदाय में श्रेष्ठतम व्यक्तियों का होना, इतिहास सहज आंकलन के रूप में भी देखा जा रहा हैं। आज भी आदर्श व्यक्ति अथवा व्यक्तित्वों को हर समुदाय, हर देश, हर परंपरा में जन सामान्य स्वीकारता हुआ देखने को मिल रहा हैं।
जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन सहज अध्ययन से मानवीयतापूर्ण आचरण प्रमाणित हो जाता हैं। मानवीयता पूर्ण आचरण सहज व्यक्ति तथा परिवारों को अब पहचानना संभव हैं। आदर्शवादी-भौतिकवादी कोई समुदाय, कोई शासन, कोई समाज सेवी संस्था ऐसे व्यक्ति, परिवार को पहचानने का प्रयास नहीं कर पाए।
परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था सहज संभावना के लिए, यही सर्वेक्षण आधार हैं। मानव में, मानवीयतापूर्ण आचरण सहज पहचान इस प्रकार से देखा गया हैं - जो स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष, दया पूर्ण कार्य-व्यवहार करता हैं। संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह और मूल्यांकन कार्य करता हैं, उभय तृप्ति सहज प्रमाण होता हैं। तन, मन, धन रुपी अर्थ को सदुपयोग, सुरक्षा करता हैं। यही मानवीयता पूर्ण आचरण का स्वरुप हैं। तन मन धन रूपी अर्थ के सदुपयोग, सुरक्षा में ही मानव व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी है, और अखण्ड समाज रचना, रचना कार्य और उसमें भागीदारी का निर्वाह करता है, यही जागृत परंपरा का दायित्व हैं।
वर्तमान परिस्थिति से तह स्पष्ट है कि मानव परंपरा में बढ़ रहा भ्रम जो अपना-पराया के रूप में है, परेशान कर रहा हैं। जिससे मुक्त होने के लिए मानव को पहचानना ही होगा। अस्तित्व को पहचानना ही होगा। सह-अस्तित्व को पहचानना ही होगा और जीवन को पहचानना ही होगा।
यह तथ्य, सत्य, यथार्थ अनेक समुदाय परंपरा रुपी प्रवाह में ऐसी कोई चीज दिखाई नहीं पड़ती है, इसलिए इस साक्ष्य से सम्पूर्ण समुदायों द्वारा अपने भ्रम को स्वीकारना संभव हो जाएगा। फलस्वरुप निर्भ्रमता के लिए प्रयास सहज रूप में ही होगा। इस प्रकार सभी मानव शुभ चाहते हुए भी, शुभ से वंचित रहे, इसका कारण स्पष्ट हो जाता हैं और सर्वशुभ के लिए मार्ग सह-अस्तित्व सहज प्रणाली से प्रशस्त हो जाता हैं। सह-अस्तित्ववादी प्रणाली में ही संपूर्ण भौतिकता, रासायनिकता समाधान क्रम में होना प्रमाणित हुआ हैं। सम्पूर्ण मानव समाधान के प्यासे हैं। मानव समाधान परंपरा में जीने के लिए बाध्य है। समाधान ही सुख और सौंदर्य होने के फलस्वरुप यही मानव धर्म है, यह प्रमाणित हैं।
मानव के अतिरिक्त सभी जीव, सभी वनस्पति, सभी पदार्थ उन-उन परंपरा के अनुरुप अस्तित्व में निश्चयता सहज सूत्र के अनुरुप कार्य करता हुआ अध्ययन गम्य हो चुका हैं। यही प्रधान रूप में, समाधानात्मक भौतिकवाद की सफलता हैं। भ.व. (305-315)