3.3 समाज में व्यवस्था

3.3.1 समुदाय समाज नहीं है

प्राचीन समय से अन्य शब्दों की तरह समाज शब्द भी प्रचलित रहा है। समाज शब्द का ध्वनि निर्देश तब बनता है जब इसके पहले एक निश्चित वस्तु (वास्तविकता) हो, उसे नाम चाहिए जैसे - हिन्दू समाज, मुसलमान समाज, ईसाई समाज, आदि। ये सब अपने को श्रेष्ठ मानते रहे हैं। इस प्रकार समाज शब्द के पहले अवश्य ही कोई धर्म, सम्प्रदाय, जाति, समुदाय का योग होना देखा गया है। इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय मुद्दा यही है कि इन सभी “पावन ग्रन्थों” के अध्ययन से सर्वतोमुखी समाधान की अपेक्षा रही है। यह अपेक्षा अभी भी यथावत् है। यही अग्रिम शोध का प्रवर्तन कारण है अर्थात् पुनर्विचार के लिए पर्याप्त मुद्दा है।

ऐतिहासिक गवाही के अनुसार ये सब समाज, धर्म और राज्य का दावेदार है। प्राचीन समय से अभी तक (बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक तक) धर्म व राज्य के इतिहास के अनुसार मतभेद, युद्ध, कहानियाँ लिखा हुआ है।

ये सब इतिहास वार्ता से सकारात्मक विधि से पता चलता है कि राज्य और धर्म पूरकता विरोधी हैं। जबकि मानव कुल में सर्वशुभ और उसकी निरन्तरता आवश्यक है। यह भी अनुसंधान का मुद्दा है। आदिकाल से सभी धर्म और राज्य जनसामान्य के सुख-चैन का आश्वासन ग्रन्थों और भाषणों में देते रहे हैं। धर्म व राज्य गद्दियाँ सदा ही सम्मान का केन्द्र रहे हैं। लोक सम्मान इनमें अर्पित होता ही आया है। बीच-बीच में विद्रोह भी घटित होता रहा व दोनों गद्दियों में चौमुखी असमानता देखने को मिलता है।

शोध के लिए प्रश्न :-

सर्वतोमुखी समाधान कैसे हो ?

सर्वशुभ कैसे हो ?

  • असमानता निराकरण कैसे हो ?
  • चौमुखी असमानताएँ :
  • <strong>धनी/निर्धनी</strong> : जो संग्रह किए हो वह धनी।

बली/दुर्बली : जो ज्यादा मार-काट करता हो वह बली।

ज्ञानी/अज्ञानी : जो ज्यादा प्रवचन करता हो ज्ञानी। जो प्रवचन सुनता हो अज्ञानी।

  • <strong>विद्वान/मूर्ख</strong> : जो ज्यादा किताब पढ़ा हो वह विद्वान।
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