ये चारों प्रकार की असमानताएँ राज्य, धर्म और परंपरा की ही देन हैं, क्योंकि राज्य और धर्म प्रभावशाली परंपरा रही हैं। इस धरती पर चारों प्रकार से सम्पन्नता-विपन्नता का चौखट बना ही है जिसे मानव भोग रहा है। इस धरती में देखा गया है कि राज्य-राज्य की परस्परता में विरोध सदैव बना ही है। धर्म-धर्म की परस्परता में वाद-विवाद या विरोध बना ही है। ऐसी स्थिति में चौमुखी असमानता निराकरण कैसे हो यह भी अनुसंधान-शोध का मुद्दा है। इन्हीं अनुसंधान द्वारा जनमानस के सब प्रश्नों का समाधान सर्वशुभ होना चाहिए या नहीं चाहिए ? चौमुखी असमानता दूर होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए ? सर्वतोमुखी समाधान चाहिए या नहीं चाहिए ? इन सभी प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर जिससे मिलता है उसे अपनाना ही सर्वशुभ है।
क्या समाज का मूल रूप समग्र मानव (सारे मानव) होगा या नहीं होगा ? यह भी विचारणीय बिन्दु है।
जबकि समग्र मानव ही अखण्ड समाज का आधार है तब, अभी तक विद्वान विचारकों को इसे पहचानने में क्या अड़चने रहीं ? यह सब विचारणीय बिन्दु और प्रश्न चिन्ह हैं। अभी तक परंपरा में समुदायों को समाज माना गया है। इन सब मुद्दों के मूल में मानव का अध्ययन न हो पाना है। मानव समाज में मानव का कार्य व आचरणों के निश्चयन का आधार क्या है ? यह विचारणीय मुद्दा है। ज.व. (287)
प्रचलन में समुदाय निम्न आधारों पर पाया जाता है। नस्ल-रंग, जाती, धर्म(मान्यता), भाषा, देश, धन, पद। ऊपर वर्णित क्रम में विविध समुदायों के रूप में पनपता हुई परंपरायें अपने-अपने परंपरानुगत विधि से पीढ़ी से पीढ़ी को क्या-क्या सौंपते आये और इस बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में जीती जागती पीढ़ी को क्या से क्या सौंप गया है। इन मुद्दों पर एक सामान्य अवलोकन आवश्यक है। परंपरा विगत में मानव, मानव के साथ क्या किया ? मानव मानवेत्तर प्रकृति के साथ क्या किया? यही दो अवलोकन का मुद्दा है। दोनों प्रश्नों का उत्तर मानव स्वीकार्य नही है। स. श. (14-17)
सर्वाधिक रूप में यही अभी तक देखने में मिला है कि मानव ही मानव के लिए समस्या का प्रधान कारण है। व्यक्तिवादी समुदायवादी विधि से प्रत्येक मानव समस्याओं को पालता है, पोषता है और वितरण किया करता है। परिवार मानव के रूप में प्रत्येक व्यक्ति समाधान को पालता है पोषता है और वितरित करता है, क्योंकि जो जिसके पास रहता है वह उसी को बंटन करता है। जबकि स्वायत्त मानव ही परिवार मानव के रूप में प्रमाणित हो पाता है। स्वायत्त मानव का तात्पर्य स्वयं स्फूर्त विधि से व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी होने की अर्हता से है। अ.श. (29-30)
यह भी चर्चा का मुद्दा है कि हम शासन में जीना चाहते है या व्यवस्था मे। यदि शासन चाहते हो तब अभी हो रहे भ्रष्टाचार, दूराचार, अनाचार उसी प्रकार होते रहेंगे। यदि जन मानस इसे नहीं चाहता तो परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था को अपनाना होगा। परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था अपने आप में समझदारी सम्पन्न अनेक परिवारो की संयुक्त व्यवस्था है। प्रत्येक परिवार में उपकार प्रवृति होने के आधार पर स्वत्व स्वतंत्रता अधिकार स्वयं स्फूर्त होता है। इसमें जनप्रतिनिधि किसी भी प्रकार से धन व्यय के बिना उपलब्ध होना एक महिमा सम्पन्न घटना है जिसकी