मानव का निरीक्षण करने पर पता लगता है कि परिवार मानव विधि से मानव में आवश्यकताएँ प्रतीत होती हैं। परिवार मानव का तात्पर्य एक से अधिक समझदार मानव परस्पर संबंध को पूरक विधि से पहचानने के फलस्वरुप आवश्यकताएँ अपने आप प्रतीत होती हैं। प्रतीत का तात्पर्य - प्रत्येक रूप में प्रमाणित होने का प्रयास उदय हैं। इसे प्रत्येक दो या दो अधिक मानव परस्परता में पूरकता की अपेक्षा करता हो, विश्वास करता हो ऐसी स्थिति में ही आवश्यकताएँ समझ में आती हैं। यथा जानने, मानने में आता हैं, फलस्वरुप प्रयासोदय होना पाया जाता हैं। प्रयासों की प्रक्रिया रूप में प्राकृतिक ऐश्वर्य पर विशेषकर वन, खनिज पर श्रम नियोजन होना, फलस्वरुप आवश्यकता के रूप में प्राकृतिक ऐश्वर्य परिवर्तित होना पाया जाता हैं।
परिवार व्यवस्था में जीने का मूल सूत्र विकल्प के रूप में होना समझ में आता है कि:-
- 10 या 10 से अधिक, तीन पीढ़ी, समझदार मानव = परिवार।
- संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह।
- संग्रह के स्थान पर समृद्धि।
- मानव व नैसर्गिक संबंध, हर परिवार मानव का उत्पादन में भागीदारी।
- हर परिवार में व्यवहार व उद्योग, परिवार व्यवस्था में भागीदारी।
इन सबके मूल में, प्रत्येक व्यक्ति में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान होना एक अनिवार्यता है। मानव जब तक स्वयं में, से, के लिए विश्वास नहीं करेगा, तब तक एक व्यवस्थापक रहकर अथवा एक कार्यकर्ता रहकर अथवा और भी किसी स्थिति में रहकर संतुष्टि, संतुलन, नियत नियंत्रण पाना संभव नहीं है। इस व्यवस्था को पैदा करना करेगा ही करेगा। भ.व. (305-315)
“आवश्यकता से अधिक उत्पादन = परिवार में समृद्धि”
जागृत मानव में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवसाय में स्वावलंबी, व्यवहार में सामाजिक रूप में पाया जाता है। यही परिवार मानव का स्वरूप है। जागृत मानव परिवार अपने में परस्पर संबंधों को निश्चित रूप में पहचानने, मूल्यों को निर्वाह करने, मूल्यांकन पूर्वक परस्पर उभयतृप्ति पाने के रूप में देखा जाता है। ऐसे परिवार में अपनाये गये उत्पादन कार्य में स्वयं स्फूर्त विधि से परिवार का हर व्यक्ति पूरक होना पाया जाता है। फलतः परिवार की आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन हर परिवार में समीचीन (सुलभ) रहता ही है।
परिवार में उभयतृप्ति, उसकी निरंतरता और आवश्यकता से अधिक उत्पादन उसका सदुपयोग और सुरक्षा यह स्वयं में आवर्तनशील है। इससे स्पष्टतया समझ में आता है कि मानवीयतापूर्ण परिवार में आवश्यकताएं सीमित हो जाती है क्योंकि उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता निश्चित होता है। अ.श. (52)