मानव जाति, मानव धर्म एक ही है और धरती एक है। इस आधार पर अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था मानव परंपरा में वैभवित होना सहज है। उत्पादन सुलभता अर्थात् परिवार में जितने भी परिवार मानव रहते हैं उन सबकी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य होना परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में सहज और सुलभ है। इस विधि से हर परिवार समृद्ध होने सहज समीचीनता सुलभ रहता ही है। इसी के साथ श्रम मूल्य के आधार पर विनिमय प्रणाली सर्वसुलभ होता ही है। इस विधि से लाभ-हानि मुक्त विनिमय सम्पन्न होना सहज है। फलस्वरूप लाभ से होने वाली अहमता (अहंकार) और हानि से होने वाली पीड़ा से मुक्त होना स्वाभाविक रहता ही है।
समाधान, समृद्धि, शांति और सुख का सूत्र होना और न्याय सुलभता के साथ ही वर्तमान में विश्वास होना देखा गया है।
जागृति विधि से ही संग्रह, सुविधा, पूंजी पर अधिकार की निरर्थकता स्पष्ट होती है और आकाश, खनिज, वन, समुद्र धरती पर अधिकार कल्पनाएँ भ्रामक सिद्ध हो जाती हैं। इसी क्रम में शरीर व्यापार, ज्ञान व्यापार, धर्म व्यापार, विचार व्यापार, मानव का व्यापार, बौद्धिक सम्पदा का व्यापार सम्बन्धी सभी प्रयास, प्रक्रिया, परिणाम का व्यर्थता हर मानव को समझ में आता है। यही अनुभव और जागृति सहज महिमा है। ऐसी जागृति का पहला प्रमाण स्वायत्त मानव ही होना देखा गया है। अ.व. (38-40)
सम्पूर्ण आहार आदि वस्तुएँ व्यवस्था क्रम में समृद्धि के रूप में ही संभाव्य है। क्योंकि उत्पादन के अनंतर ही उपयोग की आवश्यकता समीचीन होता है ‘जो उत्पादन में भागीदार नहीं है उन्हें उपयोग, सदुपयोग सम्बन्धी जागृति होता ही नहीं।’ उत्पादन कार्य में भागीदार नहीं है मानवीयतापूर्ण मानव के रूप में प्रमाणित होना संभव नहीं। जो उत्पादन कार्य में लगे रहते हैं वे संग्रह नहीं कर पाते हैं एवं जो संग्रह करते हैं वे सब उत्पादन कार्य में शिथिल होने की ओर है। इससे यह स्पष्ट हो गई मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञानदर्शन सम्पन्न होने के पहले अभी तक मानव व्यवस्था में जीने और समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित नहीं कर पाए। जबकि इसकी मानव मानस में नितांत आवश्यकता है।
आज भी यह सर्वेक्षित तथ्य है स्वायत्त विधि से जो-जो उत्पादन करते हैं वे सब अपने से उत्पादित वस्तु का सर्वाधिक सुरक्षा करते हैं, सदुपयोग करना चाहते हैं। सदुपयोग का ख्याति, यश न होने के फलस्वरूप कुंठित रहते हैं।
यह भी देखी गई कि जिस परिवार में उत्पादन कार्य से भागीदारी का संबंध नहीं रह जाती है ऐसे परिवार में शासन और सुविधा का समानाधिकार की प्रवृत्ति उभरी हुई मिलती है। यह भी देखा गया है अधिकाधिक परिवार जो केवल संग्रह और भोगलिप्सा में रत रहते हैं उनमे शासन और सुविधा को लेकर कटुता, वितंडावाद, विरोध, विद्रोह बना रहता है। इस प्रकार कुण्ठाएँ दिखाई पड़ती हैं। वेतन भोगी अथवा मजदूरी विधि से जो कार्यरत रहते हैं वे सब नौकरी लगते तक, मजदूरी में लगते तक कार्य करने में स्वीकृति बनी रहती है। परन्तु जब कार्यरत होते हैं, अर्थात् मजदूर, वेतनभोगी जब नियमित होते हैं उसके उपरांत अधिकांश लोगों में कार्य में शिथिलता होना देखा गया है। जो वेतनमान और मजदूरी पाते हैं उनमें विपुलता की चाह बढ़ जाती है।
उद्योग का नियंत्रण, लाभाकांक्षा से पीड़ित रहना, जिसको हम “मैनेजमेंट” कहते हैं, दूसरे भाषा से उद्योगपति भी कहते हैं, सफल उद्योग का तात्पर्य ही है अधिकाधिक लाभ प्राप्त होते रहें।