स्वीकारने वाला वस्तु जीवन ही है और भ्रम बन्धन से पीड़ित होने वाला वस्तु जीवन ही है एवं जागृत होने वाले वस्तु जीवन ही है। उसकी जागृति की निरन्तरता को व्यक्त करने वाला भी जीवन ही है। जीवन सह-अस्तित्व में अविभाज्य है। जागृति क्रम में भ्रम बंधन रूप में, जागृति भ्रम-मुक्ति है।
- जो बन्धन था, मुक्ति पाने के बाद उसका प्रयोजन क्या है?
जीवन जागृति और जागृति पूर्णता के अनन्तर उसकी निरंतरता का परंपरा के रूप में होना नियति क्रम व्यवस्था है। इस सत्यता के आधार पर जागृति पूर्णता विधि से मानव परंपरा वैभवित होना ही इसका प्रयोजन है। जीवन नित्य होने के कारण जागृति भी नित्य होना स्वाभाविक है। इन क्रम में बन्धन, भ्रम, समस्या से ग्रसित बुद्घिजीवी बनाम शब्दजीवी में यह तर्क उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि जागृति क्रम की भी निरंतरता होना चाहिए। इसके लिए जागृति पूर्ण प्रणाली से उत्तर यही है कि जागृति क्रम विधि से जीवन अथवा भ्रम बन्धन विधि से जीवन शैशवकाल से शरीर संचालन करता हुआ मानव संतान जागृत होने का अभिलाषा सहित व्यक्त होने के आधार पर अथवा प्रकाशित होने के आधार पर जागृति क्रम और जागृति पूर्ण परंपरा स्वाभाविक रूप में सहज विधि से ही जागृति प्रतिष्ठा स्थापित करना सहज है। क्योंकि जागृत परंपरा में स्वायत्त मानव के लिए अति आवश्यकीय शिक्षा-संस्कार सहज रूप में उपलब्ध रहता ही है। अतएव भ्रमबन्धन का निरन्तरता केवल जीवावस्था में ही प्रमाणित होता है। मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा में, से, के लिए भ्रमबन्धन की आवश्यकता सर्वथा निरर्थक, अनावश्यक होना पाया गया है। - आ.व. (2000) 90-91
अनुभवमूलक विधि से ही जीवन सहज सभी कार्यकलाप जैसे अनुभव और प्रामाणिकता के अनुरूप बोध और संकल्प, अनुभवमूलक विधि से प्राप्त बोध और संकल्प के अनुरूप चिंतन और चित्रण, ऐसे चिन्तन और चित्रण के अनुरूप तुलन और विश्लेषण तथा आस्वादन चयन है। यही अनुभव समुच्चय का तात्पर्य है। अनुभवमूलक विधि से शरीर संचालन विधि स्वयं ‘त्व’ सहित व्यवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी को प्रमाणित कर देता है। हर मानव व्यवस्था चाहता ही है। ऐसी व्यवस्था के लिये परंपरा स्वयं अनुभव मूलक विधि से जागृति सहज प्रमाण होना परमावश्यक है। इस क्रम में जीवन तथा शरीर का संयुक्त रूप में ही जीवन्त मानव के रूप में हर मानव प्रमाणित/मूल्यांकित होता है। शरीर में जीवन्तता अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों का क्रियाकलाप पूर्णतया जीवन का ही वैभव होना देखा गया, जीवन ही अस्तित्व में अनुभूत होना देखा गया है। अनुभवमूलक क्रम में जागृत जीवन क्रियाकलाप स्वाभाविक होना समझा गया। - आ.व. 42-45
भ्रम बंधन से मुक्त होना मोक्ष है यही जागृति सहज प्रमाण है। - आ.व. 75