• आवेश: अतिक्रमण या आक्रमण से प्राप्त दबाव ही आवेश है
  • हठ: अपने विचार या व्यवहार से पूर्णत: प्रभावित हो जाना हठ है I
  • अभिमान: आरोपित मानदण्ड, यही अधिमूल्यन, अवमूल्यन, निर्मूल्यन दोष है। भ्रमित (आरोपित) चित्रण की अभिमान संज्ञा है। भ्रमित मानव मान्यता पूर्वक चित्रण क्रिया से स्वयं को श्रेष्ठ मानने से इच्छा बन्धन होता है। स्व-बल, बुद्धि, रूप, पद व धन को श्रेष्ठ तथा अन्य को नेष्ट मानने वाली प्रवृत्ति की अभिमान संज्ञा है। आरोपित मान ही अभिमान है।
  • अहंकार: आत्मबोध रहित बुद्धि की अहंकार संज्ञा है। जिस प्रकार असत्य का अस्तित्व नहीं है, उसी प्रकार अहंकार का भी अस्तित्व नहीं है।

विषमतापूर्ण विचार ही क्षोभ है। क्षोभ का तात्पर्य दूसरों के प्रभाव से क्षुब्ध हो जाना ही है, अथवा अपने व्यवहार से दूसरों को क्षुब्ध करना ही है। - व्य.द. (1978) अध्याय १४, १७, व्य.द. 2011

  • बुद्धि (अहंकार) क्षुब्ध मनुष्य अपने ज्ञान को श्रेष्ठ,
  • चित्त-क्षुब्ध मनुष्य अपने तर्क को श्रेष्ठ,
  • वृत्ति-क्षुब्ध मनुष्य अपने कार्य को श्रेष्ठ समझता है।

फलस्वरूप ही वादविवाद उत्पन्न होता है I

किसी व्यक्ति, परिवार, समुदाय को अथवा संपूर्ण समुदायों को विवशतायें स्वीकृत नहीं हो पाती हैं। यही मुख्य बिन्दु है जिस पर विचार करना आवश्यक है। विवशताओं से मुक्ति हर एक मानव में आवश्यकता के रूप में होना पाया जाता है, ऐसे विवशता का मूल रूप ही बंधन है। ऐसे बंधनों के स्वरूप को आशा, विचार, इच्छा बंधनों के रूप में देखा गया है। यह जीवनगत क्रिया रूपी आशा, विचार, इच्छायें भ्रमित रहने पर्यन्त बंधन का, बंधन पर्यन्त आवेशों का, सम्पूर्ण आवेश पर्यन्त विवशताओं का होना आंकलित होता है। इसे प्रत्येक व्यक्ति निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक समझ सकता है।

मानव जीवन के अध्ययन क्रम में यह पाया गया है, जीवन ही भ्रम अथवा अजागृतिवश किये जाने वाली क्रियाकलाप भ्रम के रूप में बंधन को और जागृति पूर्णतापूर्वक बंधन से मुक्ति को अनुभव करना एक सहज क्रिया है। इस प्रकार जीवन जागृति ही बंधन मुक्ति का स्वरूप होना, कार्य होना, व्यवहार होना, व्यवस्था और आचरण होना पाया गया है।

जागृति मूलक विधि से जागृतिगामी कार्यक्रम सफल होता है। जागृति मूलक अभिव्यक्ति संप्रेषणाओं को कोई न कोई एक मानव अपने अनुसंधान पूर्वक निश्चित चिंतन, अभ्यास, विचार, अनुभव प्रमाण के आधार पर ही इसका अभिव्यक्ति, संप्रेषणा संभव होना पाया जाता है। जागृति सर्वमानवों में स्वीकृत तथ्य है जैसे प्रत्येक व्यक्ति प्रत्येक कार्य, व्यवहार विचारों को जागृतिपूर्वक ही सटीक मानने का प्रमाण वर्तमान होना पाया जाता है। - स.श. 29-31

मानव ही दृष्टापद प्रतिष्ठा के प्रमाणों को प्रमाणित करने योग्य इकाई है। क्योंकि मानव में ही न्याय, धर्म, सत्य दृष्टि प्रमाणित होना पाया जाता है। दृष्टियाँ प्रिय, हित, लाभ रूप में भी भ्रान्तिपूर्वक कार्यशील होता है। भ्रमित होने का मूल

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