कारण शरीर को जीवन समझना ही है। इसी भ्रमवश मानव को व्यक्ति और समुदाय के रूप में विचारों का फैलना देखा गया है। व्यक्तिवाद अहमता का द्योतक है। यही समुदाय विधा में युद्घ, द्रोह, विद्रोह, शोषण मानसिकता है। मानव संचेतनावादी मानसिकता में न्याय, धर्म, सत्य ही विचारों का आधार हो पाता है। इसीलिये समाधान, समृद्घि, वर्तमान में विश्वास (अभय) और सह-अस्तित्व में प्रामाणिकता के रूप में हर जागृत व्यक्ति स्वयं स्फूर्त विधि से संपन्न होता है। इससे पता लगता है हर मानव बहुआयामी होने के कारण जागृति पूर्वक ही सभी आयाम-कोणों में मानवत्व को प्रमाणित करना बना रहना यही समाज और समाजशास्त्र का प्रधान आशय है। - स.श. 253
अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन विधि से सह-अस्तित्व में ही विकासक्रम और विकास जागृति क्रम, जागृति के रूप में देखा गया है जिसे पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, ज्ञानावस्था के रूप में होना स्पष्ट किया जा चुका है। इसी के साथ ज्ञानावस्था में भ्रमवश बन्धन और जागृतिवश मोक्ष होता है। जिसमें से बंधन को विस्तार से आशा बन्धन, विचार बन्धन और इच्छा बन्धन के रूप में विश्लेषित कर चुके हैं।
यह तीनों प्रकार का बन्धन शरीर को जीवन मान लेने से और इन्द्रिय सन्निकर्ष से ही सम्पूर्ण सुख का स्रोत मानने के परिणाम में भ्रम सिद्घ होना पाया गया। जबकि जीवन अपने जागृति को व्यक्त करने के लिये शरीर एक साधन है, इन्द्रिय सन्निकर्ष ही एक माध्यम है। मानव परंपरा ही जीवन जागृति प्रमाण का सूत्र और व्याख्या है। यही भ्रम और निभ्रम का, जागृति और अजागृति का निश्चित रेखाकरण सहज बिन्दु है। - आ.व. 157-158
(*इस ढंग से) अजागृत मानव मन का सहज कार्यकलाप, इन्द्रियों की तादात्मता वश, इन्द्रिय संवेदनाओं को सत्य समझने के आधार पर अथवा शरीर को जीवन मान लेने के आधार पर भ्रमित होना पाया जाता है। इसी के पक्ष में जीवन सहज, विचार और इच्छा संयुक्त होकर कल्पनाशीलता का प्रसव और कार्य होते ही रहता है। आलंबन के लिए प्रिय, हित, लाभात्मक दृष्टियां कार्यरत हो जाती हैं, फलस्वरूप इन्द्रिय तृप्ति के लिए दिवारात्रि सोचता हुआ, कल्पना करता हुआ, चित्रित करता हुआ, प्रयास करते हुए, प्रयोग करते हुए, मनुष्यों को पहचाना जा सकता है। इस प्रकार मान्यता का दो पक्ष स्थापित होता है, जिसमें से इंद्रिय संवेदना सापेक्ष मनोविज्ञान प्रचलित हो चुका है। जिसके लोकव्यापीकरण होने के उपरान्त भी मानव परम्परा, बेहतरीन समाज की (अर्थात् व्यक्ति समुदाय मानसिकता के चंगुल से छूटकर, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सहज) मानसिक व्यवस्था बन नहीं पाई।
इसका मूल कारण, इंद्रिय संवेदनाओं को सत्य मानना रहा अथवा अनिवार्य मानना रहा। जबकि जीवन-ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण ध्रुवों के आधार पर, मानव संचेतनावादी मानसिकता (अथवा मनोविज्ञान) स्पष्ट हो जाता है क्योंकि मानव संचेतना का तात्पर्य ही है, जानने मानने, पहचानने, निर्वाह करने में तृप्ति और उसकी निरंतरता का नित्य वर्तमान होना। ऐसे वर्तमान होने का, मानव परम्परा में ही प्रमाणित होना, सहज है। - म.वि. 38-39
(*प्रिय का तात्पर्य) इंद्रियों के योग-संयोग वश स्वीकृत संकेत सापेक्ष प्रवृत्ति और मानसिकता होना पाया जाता है। इंद्रियों का कार्य-कलाप, जीवन अनुग्रह रूपी, जीवंतता पूर्वक संपादित होता है। सभी मनुष्य जीवन्त रहते ही इंन्द्रिय सन्निकर्षात्मक कार्य करते हैं। अर्थात् इंद्रिय गोचर होने वाले, सभी क्रिया-कलापों को विषय नाम दिया गया है। ऐसा विषय, विषयापेक्षा सहित, शरीर को ही जीवन मान लेने की स्थिति में, जीवन की महिमा सहज कार्य-कलापों, प्रयोजनों को पाना संभव नहीं हो पाया। इसी कारण मनुष्य चाहता कुछ है, करता कुछ है और होता कुछ है।