इंद्रिय जीवन्त रहने के फलस्वरूप ही सन्निकर्षात्मक क्रिया है (अर्थात् इन्द्रियों का संयोग होने के उपरान्त, संयोग के अर्थ को साक्षात्कार करने की क्रिया से है)। ऐसे सन्निकर्ष में आए, वस्तुओं के योग-संयोग से सुख-दुख भासते हुए देखा जाता है। जिसमें सुख भासता भी है, उसकी निरंतरता को सन्निकर्षात्मक विधि से पाना संभव नहीं हुआ, प्रमाणित नहीं हुआ। इसी सत्यतावश इंद्रियों के आधार पर, किया गया नाप-तौल और निर्णय, वांङ्गमय और कार्य-कलाप जो प्रस्तुत किया गया, वे सभी योजनाएं असामाजिक होना पाई गईं। इस प्रकार शरीर पर आधारित, जितनी भी अभिव्यक्तियां हुई, उनसे सार्वभौम व्यवस्था, समाज न्याय, अखंड समाज, सर्वतोमुखी समाधान सहज परम्परा को पाना संभव नहीं हुआ। इसलिए बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक समुदाय चेतना ने, साथ ही अंतर विरोध और परस्पर समुदायों के बीच युद्घ और युद्घ की तैयारियों ने, मानव को विवश कर रखा। जबकि सबसे प्रिय सुख, सुन्दर, समाधान, समृद्घि इनमें सामरस्यता का कार्य-कलाप भी, मानव परम्परा के लिए व्यावहारिक प्रवृत्ति का आधार है, यह मानव सहज अस्तित्व में पाया जाता है। – म.वि. 67

इंन्द्रियों का दृष्टा है जीवन ! (*अर्थात्) जीवन, भ्रमित होने के कारण इंन्द्रिय सन्निकर्षात्मक क्रिया कलाप में जीवन अपने दृष्टा पद को जीने की आशा, आस्वादनापेक्षा के आधार पर सम्मोहन और आवेश पूर्वक इन्द्रिय सन्निकर्ष में तद्रुप स्वीकार लेता है। तद्रुपता का तात्पर्य मैं स्वयं इन्द्रिय हूँ। इस प्रकार की स्वीकृति में स्वयं स्वअस्तित्व भुलावा हो जाने से है। अस्तु, जीवन ही जीवन को जीवन से, जीवन के लिये बेहोशी में सुख पाने की स्वीकृति अर्थ में स्वयं की विस्मृति स्वीकृत होना पाया जाता है। परिणामस्वरूप जीवन भ्रमित रहना पाया जाता है। इस प्रकार जीवन आस्वादनापेक्षा और इन्द्रिय सन्निकर्ष में सीमित हो जाता है। यही पशुवत जीने का आधार और प्रवृत्ति है। जबकि जागृति पूर्वक जीवन इंद्रिय सन्निकर्ष का दृष्टा होता ही है। न्याय, धर्म, सत्यपूर्वक इन्द्रिय सन्निकर्षों को उपयोग सदुपयोग प्रयोजनशील विधि से प्रमाणित करने का कार्यक्रम स्वयं स्फूर्त विधि से होता ही है ।- म.वि. 218-219

(C) ‘बन्धन’ एवं ‘मुक्ति’ सम्बंधित स्पष्टीकरण

मानव परंपरा में हर संतान अथवा हर मानव कल्पना सहज स्वीकृति के रूप में जागृति को वरना देखा गया है। हर मानव रूपी वस्तु, हर स्थिति, हर गति के प्रति जागृत होना चाहता है, हर सम्बंधों को पहचानना चाहता है जागृत होना चाहता है और इन सबके मूल में सुखी होना चाहता है। इस क्रम में इन्द्रिय सन्निकर्ष विधि से सुखी होने के लिये तमाम विधियों को अपनाते हुए संग्रह सुविधा के चक्कर में आदमी फँस गया। संग्रह विहीन स्थिति में व्यक्ति अपने को निरीह अकेले पाता है। संग्रह के आधार पर ही भोग, अतिभोग का आस्वादन किया जाना मान लिया गया है। फलस्वरूप संग्रह का आवश्यकता और विस्तार उसके अनुकूल शोषण प्रवृत्ति, कार्य, तरीके तैयार होते गये। बंधन के व्यवहार रूप को इसी स्वरूप में देखा गया है। हर कार्य और तरीके के मूल में मानसिकता (आशा, विचार, इच्छा) का होना सुस्पष्ट है। जीवन ही मानसिकता के रूप में कार्य करना स्पष्ट है।

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