एक से अधिक परमाणु, अणु, अणु रचित पिण्ड और परमाणु ही स्वयं गठनपूर्णता सहित जीवन पद में संक्रमित होने, अमरत्व अर्थात् परिणाम विहिन स्थिति गति सहित सम्पन्न होने का साक्ष्य, आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, प्रमाण के रूप में दृष्टव्य है। आशा और आंशिक विचारों के रूप में जीवों में दृष्टव्य है। पक्षी अपने घोंसले में, जानवर अपने-अपने स्थान पर लौट जाते हैं यह आंशिक विचार होने को प्रमाणित करते हैं। वनस्पतियों में जीवन होता नहीं है अर्थात् झाड़-पौधे को जीवन संचालित करता नहीं है।
मानव में जीवन का अध्ययन मानव से ही हो पाता है। जीवन सहज वैभव और साक्ष्य आशा, विचार, इच्छा, संकल्प, प्रामाणिकता के रूप में मानव परंपरा में देखने को मिलता है। जीवन क्रियाएं स्वाभाविक रूप में अपने अर्थों को सर्वमानव में प्रकाशित करते ही रहते हैं और स्वीकृत रहते हैं। मानव आशा, विचार, इच्छाओं को कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा व्यक्त करते हुए शरीर को जीवन मानता हुआ देखा जाता है। उक्त विधि से आशा, विचार, इच्छाओं को कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों की सीमा में परिसीमित करना जब संभव नहीं हो पाता है तभी से आशा, विचार, इच्छाओं का मूल रूप जानने, मानने, पहचानने की इच्छाएं स्वयंस्फूर्त होना पाया जाता है। इसी के साथ-साथ आशा, विचार, इच्छा, संकल्प और प्रामाणिकता और आस्वादन, तुलन, चिन्तन बोध और अनुभव जीवन सहज क्रियायें होने के कारणवश जीवन समुच्चय आशा, विचार, इच्छा के परिसीमा में व्याख्यायित नहीं हो पाती है। यही मुख्य कारण है।
जीवन प्रत्येक मानव में मूल रूप है। जीवन शक्तियाँ और बल अविभाज्य रूप में क्रियाशील रहते ही हैं। इसी कारणवश जीवन के आँशिक क्रियाविधि से सम्पूर्ण क्रियाओं का व्याख्या होना संभव ही नहीं है। अनुभव के अनन्तर सम्पूर्ण क्रियाएं सहज रूप में वर्तमान रहता ही है तथा सभी क्रियाएं अनुभव के अनुरूप होना देखा गया है। अनुभव सह-अस्तित्व में ही होता है। प्रत्येक मानव अपने अस्तित्व को स्वीकारता ही है जबकि शरीर समयाविधि के अनुसार विरचित हो जाता है। इसे परंपरा के रूप में देखा गया है। इसलिये ऐसी शरीर रचना-विरचना को जन्म और मृत्यु कहा जाता है। जबकि जीवन ज्ञान के अनन्तर जीवन का अमरत्व, स्वाभाविक रूप में जीवन को समझ में आता है।
(*इस ढंग से) जीवन ही जीवन को, जीवन से जानने-मानने की व्यवस्था बनी हुई है। प्रत्येक मानव स्वयं का अध्ययन कर सकता है। क्योंकि प्रत्येक मानव में चयन-आस्वादन, विश्लेषण-तुलन, चित्रण-चिन्तन, संकल्प-बोध, प्रामाणिकता और अनुभव, सम्पन्न होता हुआ देखा जा सकता है। प्रत्येक मानव में यह सभी क्रियायें पूर्णतया क्रियाशील होना, इसके दृष्टापद में होना, यह सब सत्यापित प्रमाणित होना ही मानव में जागृत परंपरा का स्वरूप है। उल्लेखनीय तथ्य यही है कि प्रत्येक मानव जागृत होना चाहता है। जागृति और अजागृति के बीच कौन सी ऐसी वस्तु है, कारण है, इसे परिष्कृत रूप में समझना ही एक मात्र उपाय है। हम इसे स्पष्टतया देखे हैं और सभी देख सकते हैं कि शरीर को जीवन समझना ही मूल मुद्दा है भ्रम का। इसके साथ जुड़ा हुआ दूसरा मुद्दा शरीर के बिना मानव परंपरा नहीं है। इन्हीं के अनुपम संयोग से ही अनेक समस्या और समाधानकारी गति और प्रवाह है। प्रत्येक मानव किसी न किसी अंश में आशा, विचार, इच्छा के रूप में प्रभाव है क्योंकि यह दूर-दूर तक प्रभावित करते आया। इसीलिये इसे प्रवाह