• वस्तु के रूप में कौन सी चीज है जो बन्धन में पड़ा रहता है?

भ्रमित जीवन ही बन्धन के रूप में अपने को चार विषय पाँच संवेदनाओं को राजी करने के रूप में व्यक्त करता है। यही मानव परंपरा में मानसिकता का अर्थ है। जीवन में मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि और आत्मा अक्षय बलों के रूप में कार्यरत रहना और आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रमाण अक्षय शक्ति के रूप में कार्यरत रहना स्पष्ट हो चुकी है।

  • ‘वस्तु’ के रूप में कौन सी चीज है जो बाँधकर रखती है ?

उत्तर में यही मिलता है कि कोई वस्तु अस्तित्व में ऐसी नहीं है जो जीवन को बंधन में डालती हो। अस्तित्व स्वयं ही सह-अस्तित्व होने के कारण नित्य व्यवस्था सहज प्रेरणा सूत्र है। जीवन जागृति के अनन्तर व्यवस्था में जीने की संभावना हर मानव के लिए समीचीन है।

इससे स्पष्ट है जीवन लक्ष्य रूपी जागृति और जागृति पूर्णता के पहले जो स्थिति-गतियाँ आशा, विचार और इच्छा-प्रिय, हित, लाभ, भय, प्रलोभन और आस्था और इनके संयोग योग से जितने भी क्रियाकलाप होते हैं ये भ्रम रूप होना देखा गया है। यही बन्धन है।

  • वस्तु के रूप में कौन सी चीज है जो मुक्ति दिला दे ?

जीवन जागृति पूर्वक स्वयं में, स्वयं से, स्वयं के लिये भ्रम-मुक्ति पा लेता है। जीवन अस्तित्व सहज वस्तु होना सुस्पष्ट है क्योंकि मूल में सम्पूर्ण परमाणु वस्तु है जीवन भी एक गठनपूर्ण परमाणु होना स्पष्ट है। मुक्ति दिला सकने वाला जीवन से भिन्न कोई वस्तु नहीं है। ‘जीवन’ के लिए प्रेरक वस्तु सह-अस्तित्व में स्वयं जागृत जीवन ही है क्योंकि सह-अस्तित्व स्थिर है, जागृति निश्चित है।?.

  • ‘वस्तु’ के रूप में ऊपर कहे गये तीनों कहाँ है ?

अस्तित्व में ही जीवन है। जीवन अपने लक्ष्य रूपी जागृति को प्रमाणित करने के पहले भ्रमित रहता है। जैसे सही करने के पहले गलती करता है। परम जागृति जीवन का लक्ष्य है और परम जागृति अस्तित्व में अनुभव सहज प्रमाण ही है। इस प्रकार जीवन जागृति क्रम में भ्रम बन्धन को व्यक्त करता है, पीड़ित होता है, फलस्वरूप जागृत होने की आवश्यकता बनती है। इस प्रकार अस्तित्व नित्य वर्तमान, अस्तित्व में जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जागृति और जागृति पूर्णता अस्तित्व सहज जीवन में, से, के लिए सम्पूर्ण प्रमाण सहज क्रियाकलाप है।

  • क्यों ऐसे बन्धन कृत्य को करता है ?

जीवन जागृति क्रम सहज विधि से भ्रम बन्धन का पीड़ा अपने आप स्पष्ट होता है। इसे जीवन ही स्वीकारता है। भ्रमात्मक कार्यकलाप जीवन में से साढे चार क्रिया के रूप में ही निष्पन्न होती है। जीवन में जागृति दस क्रिया के रूप में होना एक आवश्यक मंजिल होना, उसकी निरंतरता प्रमाण रूप में स्वाभाविक होना देखा गया। भ्रमबन्धन पूर्वक मानव परंपरा अनेक समुदायों में है, जागृति और जागृति पूर्णता उसकी निरन्तरता सहज वैभव के रूप में अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था वैभवित होती है। इस प्रकार अस्तित्व में भ्रम बन्धन को व्यक्त करने का वस्तु जीवन है। भ्रम को

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