मुद्दा जागृतिपूर्ण अभिव्यक्ति के लिये वस्तु रहा आया। यही अभी अनुभवमूलक विधि से अनुभवगामी प्रणाली पूर्वक अस्तित्व बोध, सह-अस्तित्व बोध, विकास बोध, जीवन बोध, जीवन जागृति बोध, रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना बोध संभव हो गया। ऐसे बोध कराने के क्रम में एक से अधिक मानव बोध सम्पन्न हो चुके हैं। इसी प्रमाण से यह पता लगता है कि इसका लोकव्यापीकरण संभव है।
मूल व्यक्ति, जो अनुसंधान पूर्वक सत्यापित करता है, वह सत्य, समाधान, न्याय और जागृति के सम्बंधों में स्वयं को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे सत्यापन को ही वाङ्मय कहा जा सकता है। यह दोनों स्थिति घटित होने के उपरान्त मूल व्यक्ति के रूप में प्रामाणिकता सहित प्रस्तुतियाँ बोधगम्य हो जाना ही, मूल व्यक्ति के रूप में और व्यक्ति भी जागृत बोध सम्पन्न होने का प्रमाण होता है। बोध सहज अभिव्यक्ति प्रयास में सह-अस्तित्व में ही संपूर्ण वस्तु होना स्वयं मानव में, से, के लिए अनुभव होता ही है। इस विधि से अनुभव मूलक अध्ययनप्रणाली अनुभवगामी विधि को सत्यापित करती है। अध्ययन की सार्थक मंजिल अध्ययनपूर्वक इंगित वस्तुएँ विधिवत बोध होने के रूप में सार्थक हो जाता है। यह अनुभव सम्पन्न मानव से ही सफल होता है। - आ.व. १४०-१४२
जीवन में निरन्तर सम्पन्न क्रिया कलापों में से मन एक क्रिया है, दूसरी क्रिया है वृत्ति (विचार), तीसरी क्रिया है साक्षात्कार (चित्त) किसी को समझने के लिए, अर्थ स्वीकृति के लिए, अर्थ पूर्वक वस्तु स्वीकृति के लिए जो प्रायोजित है। जैसे पानी शब्द के साथ ही पानी रुपी वस्तु को अस्तित्व में स्वीकारने की क्रिया यह चित्त क्रिया है। इसी प्रकार बुद्घि में बोध क्रिया, बोध क्रिया निश्चयता, स्थिरता को स्वीकारने की अर्हता, इसी को दूसरी भाषा में सत्य, धर्म, न्याय को दृढ़ता पूर्वक स्वीकारने की क्रिया है। पाँचवीं क्रिया अनुभव क्रिया। अनुभव क्रिया की महिमा नित्य समाधान, नित्य सुख, शान्ति, संतोष, आनन्द के रूप में सत्य को स्वीकारने, प्रमाणित करने और आनन्द रुपी आश्वासन से परिपूर्ण होने की क्रिया है। ये पाँचों क्रियायें जीवन बल के रूप में कार्य करता हुआ स्पष्ट होता है। अनुभव ही प्रमाण है। इसका फलन आनन्द है। जीवन स्वत्व है, इसको प्रमाणित करने के क्रम में संकल्प, संकल्प को परावर्तित करने के लिए चित्रण, चित्रण को सार्थक बनाने के लिए विश्लेषण, विश्लेषण को क्रियान्वयन करने के लिए चयन (तौर-तरीका का चयन) पूर्वक प्रमाणित करता हुआ मानव को पहचाना जा सकता है। इस विधि से ये पाँचों परावर्तित होने वाली क्रियाओं को शक्ति नाम दिया गया। इसी बल को स्थिति, परावर्तित करने वाले क्रिया को गति नाम दिया है। इस प्रकार मानव का स्थिति, गति, जीवन क्रियाकलाप के आधार पर अर्थात् जीवन के स्थिति गति के आधार पर परस्पर पहचानने में आता है। -क.द. 162
जीवन रचना के आधार पर जीवन में आत्मा अविभाज्य क्रिया होना स्पष्ट हो गई है। अस्तित्व में अनुभव ही आत्मा सहज क्रिया है। अनुभव ही दूसरे नाम से प्रत्यावर्तन क्रिया है और इसका परावर्तन क्रिया को प्रामाणिकता-प्रमाण नाम दिया है। अनुभव मूलकता आत्मा में होने वाली क्रिया है। यही परम जागृति है। यह जागृति सह-अस्तित्व में अनुभव मूलकता आत्मा में होने वाली जागृति ही है। जागृति सह-अस्तित्व में अनुभव हुई है।
इसी जागृत स्थिति में होने वाली गति को प्रत्यावर्तन नाम दिया गया है। सम्पूर्ण प्रत्यावर्तन दर्शन और ज्ञान नाम से प्रतिष्ठित हैं। ज्ञान और दर्शन स्वाभाविक रूप में ओत-प्रोत रूप में वर्तमान है। सम्पूर्ण अस्तित्व सत्ता में संपृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति ही सह-अस्तित्व का मूल स्वरूप है। इसका सामान्य कल्पना हर मानव में होना संभव है। कल्पना का मूल स्त्रोत आशा, विचार, इच्छा का अस्पष्ट गति रूप है क्योंकि सम्पूर्ण कल्पनाएँ परावर्तन में कार्यरूप रहना देखा