जानने-मानने के संतुलन बिंदु का नाम है बोध। जानने-मानने के तृप्ति बिंदु का नाम है अनुभव।- संवाद, २०१०

प्रामाणिकता का स्वरूप जानने-मानने की तृप्ति बिन्दु को अनुभव करना ही है। जानने का मूल तत्व सह-अस्तित्व रूपी अस्तित्व ही है। अस्तित्व में ही जीवन और जागृति, अस्तित्व में ही विकास और रचना-विरचना होना देखा गया है। यही जानने का तात्पर्य है। इसी के आधार पर मानव का सम्पूर्ण कार्य-व्यवहार निर्धारित हो जाना ही, निर्धारित विधि से मानव परंपरा प्रमाणित होना ही अनुभव का तात्पर्य है। यह न्याय, धर्म, सत्य सहज अनुभव विधि से ही सार्थक होना देखा गया है।

ऊपर जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने का शब्द प्रयोग किये हैं। इनमें से जानने की वस्तुओं में से प्रधान वस्तु को सह-अस्तित्व के रूप में बता चुके हैं। अस्तित्व ही सह-अस्तित्व के रूप में नित्य वर्तमान है। सह-अस्तित्व का स्वरूप अपने में सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। क्यों और कैसे का उत्तर पा लेना ही जीवन जागृति क्रम सहज प्रवर्तन और जागृतिपूर्वक प्राप्ति है। हर प्रवर्तन में मानव प्राप्ति चाहता ही है। प्राप्ति ही मान्यता का आधार है। अस्तित्व में ही जीवन और जीवन जागृति का होना जानना है। अस्तित्व में ही विकास, रचना, विरचनाओं को जानना होता है। क्योंकि अस्तित्व नित्य वर्तमान है ही; अस्तित्व में ‘जो कुछ’ भी है यह ‘सब कुछ’ को मानव जानना चाहता है। इसे जानना सम्भव है इसको हम देख चुके हैं। मानव और नैसर्गिक परस्परता में सम्बन्ध रहता ही है क्योंकि सह-अस्तित्व नित्य प्रभावी रहता ही है। इसे जानना जागृत मानव के लिये सहज है। इसी के साथ अर्थात् सम्बन्ध के साथ मूल्यों को जानना भी जागृत मानव के लिए परम सहज है। मानव ही अस्तित्व में अनुभव सहज प्रमाणों को प्रस्तुत करता है। अस्तित्व में मानव जागृतिपूर्वक ही व्यवस्था, उसकी सार्वभौमता, समाज और उसकी अखण्डता को जानता है।

जानने का फलन मानने के रूप में आता ही है। मानने का स्वरूप है :- ‘‘यह सत्य है इसे स्वीकारना है।’’ और सत्य सहज प्रयोजन स्वयं से या सबसे जुड़ी हुई स्थिति को और गति को स्वीकारना ही मानना है। इससे स्पष्ट होता है हर स्थिति में वस्तु सहज वास्तविकताओं को जानना सहज है। इसी क्रम में उसके गति और प्रयोजन के साथ ‘सह-अस्तित्व’ में, से, के लिये आवश्यकताओं को स्वीकारना ही मानना है क्योंकि प्रयोजन हर व्यक्ति में एक आवश्यकता है। इसलिये जानने-मानने की क्रिया मानव में परम मौलिक है। अन्य प्रकृति में यांत्रिक रूप में ही पहचानने, निर्वाह करने की क्रियाकलापों को देखा जाता है।

मानव ही जानने-मानने के आधार पर पहचानने-निर्वाह करने में प्रयोजनशील होता है। मानने का आधार प्रयोजन होना है। जानने का आधार क्यों और कैसे के उत्तर के रूप में है। साथ ही ‘वस्तु’ कैसा है ? यह भी जानने में आता है। वस्तु कैसा है? यह जानने का स्वरूप है। इसी से क्यों और कैसे का उत्तर स्वयं स्फूर्त विधि से निर्गमित होता है। मानने का तात्पर्य प्रयोजन पहचानने के अर्थ में सार्थक होता है। जैसे-अस्तित्व सहज नित्य स्थिति को जानना, सह-अस्तित्व प्रयोजन सूत्र को पहचानना स्वाभाविक होना पाया गया।

अस्तित्व सहज सह-अस्तित्व को पहचानने की क्रिया-स्वरूप ही निर्वाह करने के अर्थ को प्रमाणित कर देता है। इस प्रकार जानना-मानने के लिये उत्सव और उत्साह है; जानना-मानना, पहचानने के लिये उत्सव और उत्साह है; जानना-मानना-पहचानना, निर्वाह करने के लिये उत्सव और उत्साह है। यह सर्वमानव में हृदयंगम और स्वीकार्य योग्य सूत्र है। - आ.व. 15-18

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