(*इस ढंग से) जागृति जीवन में ही घटित होना पाया जाता है और प्रमाण-प्रयोजन मानव परंपरा में होना पाया जाता है। जागृति का संपूर्ण स्वरूप जानना-मानना-पहचानना-निर्वाह करना, दूसरे प्रणाली से अनुभवमूलक विधि से अभिव्यक्ति, संप्रेषणा एवं प्रकाशन करना ही है। जानने-मानने की संपूर्ण वस्तु अस्तित्व, अस्तित्व ही सह-अस्तित्व, सह-अस्तित्व में परमाणु विकास, परमाणु विकास क्रम में गठनपूर्णता (चैतन्य पद) में संक्रमित होना और जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम , जीवन जागृति (क्रियापूर्णता), जीवन जागृतिपूर्णता (आचरणपूर्णता) और उसकी निरंतरता, रासायनिक-भौतिक रचना विरचना आवर्तनशील और पूरक विधि से अध्ययन करना सहज है। जीवन ही दृष्टा, कर्ता, भोक्ता पद में होने के कारण अध्ययन करने में समर्थ है। मानव शरीर भी एक रासायनिक, भौतिक रचना है। अस्तित्व ही सह-अस्तित्व के रूप में नित्य प्रभावी होने के कारण जीवन और शरीर का सम्बन्ध और सह-अस्तित्व सहज रूप में देखने को मिलती है।

इसी कारणवश शरीर को जीवन्त बनाए रखते हुए जीवन अपने निज ऐश्वर्य को, अर्थात् जागृतिपूर्ण ऐश्वर्य को मानव परंपरा में प्रमाणित करने के क्रम में जीवन क्रियाकलाप प्रमाणित होता है। अस्तु आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा, और अनुभव प्रमाण, जीवन के वैभव हैं ही, इनमें से आशा, विचार, इच्छाएं, अनुभवपूत होने पर्यन्त भ्रमित रहना देखा गया है। अनुभवपूत होने का तात्पर्य अनुभवमूलक विधि से आशा, विचार, इच्छाओं को शरीर के द्वारा मानव परंपरा में और नैसर्गिक परिवेश में व्यक्त और प्रयोग करने से है। भ्रम का तात्पर्य जो जैसा है उससे अधिक, कम या उस वस्तु से भिन्न वस्तु मान लेने से है। निर्भ्रमता का तात्पर्य भी सुस्पष्ट है कि जो जैसा है उसे वैसा ही जान लें, मान लें, पहचान लें और निर्वाह कर लें। जो जैसा है का तात्पर्य सह-अस्तित्व में चार अवस्था व चार पदों का होना इंगित करा चुके हैं। इस प्रकार जीवन ही दृष्टा पद में होना, जीवन और शरीर का संयुक्त रूप में मानव परंपरा का होना जिसका प्रयोजन सर्वशुभ होना, सर्वशुभ घटित होने के लिए मानव परंपरा ही जागृत होना एक अनिवार्य स्थिति है। -अ.श. 34, 35

(G) मध्यस्थ क्रिया की महिमा

मध्यस्थ क्रिया उसकी महिमा और उसकी अक्षुण्णता को जानना-मानना-पहचानना, तद्नुसार निर्वाह करना मानव सहज मौलिकता है। मध्यस्थ क्रिया अपने आप में स्वभावगति का नित्य स्त्रोत होना सभी अवस्थाओं में पहचाना जाता है। इसी क्रम में ज्ञानावस्था में कार्यरत जीवन में भी स्वभावगति और आवेशित गति को पहचानना सहज है। इस सहजता को इस प्रकार पहचाना गया है कि मानवत्व सहित अभिव्यक्त और प्रकाशित होना मानव सहज स्वभाव गति है। अमानवीयता वादी प्रकाशन और कार्यकलाप आवेशित गति के रूप में दिखाई पड़ती है। अमानवीयतावादी प्रवृत्तियाँ संघर्ष, युद्घ, शोषण, द्रोह, विद्रोहरत रहना पाया जाता है जबकि मानवीयतापूर्ण आचरण, व्यवहार और व्यवस्था गतियाँ स्वभावगति समाधान के रूप में देखने को मिलता है।

जागृतिक्रम में आशा, विचार, इच्छा बन्धन रहते हुए मानव प्रिय, हित, लाभवादी कार्यकलापों में व्यस्त रहते हुए भी जीवन सहज नियंत्रण, शरीर को जीवंत और नियंत्रित बनाये रखने में ‘मध्यस्थ क्रिया’ कार्यरत रहता है। इसी के साथ-साथ अव्यवस्था की पीड़ा, व्यवस्था की भासपूर्वक आवश्यकता, और पाने की आशा ‘मध्यस्थ क्रिया’ के रूप में ही निर्गमित होती है। अतएव जागृति की संभावना की ओर ध्यानाकर्षण होना ‘मध्यस्थ क्रिया’ की ही महिमा है।

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