मानव पंरपरा सदा-सदा ही सुखापेक्षा में पीढ़ी से पीढ़ी में गुजरता आया है। सुख सर्वसुलभ होने का क्रम ही सार्वभौम व्यवस्था, विधि और अखण्ड समाज रचना विधि, इन्हीं दो मुद्दे के आधार पर इसकी अक्षुण्णता को पहचाना गया है। इसकी अक्षुण्णता क्रम में भागीदारी निर्वाह करता हुआ हर मानव सुखी रहता है। – स.श. 171
सार्थक निष्कर्षों को निकालने की आवश्यकता अधिकांश लोग महसूस करते है। निष्कर्ष की ओर कल्पना, विचार, इच्छाओं को दौड़ाने पर परंपराओं की निरर्थकता समझ में आता है। इसके बदले में क्या हो- यह सार बात है। समाधानात्मक भौतिकवाद ने निर्णायक विधियों को पाने के लिए विज्ञान, विवेक और ज्ञान सम्मत तर्क प्रणाली को अपनाया। विज्ञान का तात्पर्य कालवादी, क्रियावादी, निर्णयवादी ज्ञान से है। विवेक का तात्पर्य जीवन का अमरत्व अर्थात् जीवन ज्ञान संपन्नता, शरीर का नश्वरत्व और व्यवहार के नियम अर्थात्:-
- बौद्घिक नियम
- सामाजिक नियम
- प्राकृतिक नियम से है।
बौद्घिक नियम का तात्पर्य
- असंग्रह अर्थात् आवर्तनशील अर्थ व्यवस्था में भागीदारी, आवश्यकता से अधिक उत्पादन।
- स्नेह अर्थात् संबंधों को पहचानने में, मूल्यों को निर्वाह करने में विश्वास।
- विद्या: जीवन विद्या में पारंगत रहना, पांरगत होने में विश्वास, प्रतिभा और व्यक्तित्व में सामरस्यता सहज विश्वास। व्यवहार में सामाजिक, व्यवसाय में स्वावलंबी होने में विश्वास।
- सरलता अर्थात् संबंधों को पहचानने में विश्वास मूल्यों को निर्वाह करने में विश्वास और मूल्यांकन करने में विश्वास।
- अभय अर्थात् स्वयं मानवत्व सहित व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी होने में विश्वास है।
- “जो जैसा है उसको अधिक, कम या न समझना ही अविद्या है। जो जैसा है उसे वैसा ही समझ लेना विद्या है। “जिस वस्तु को समझना है उसका पूर्ण विश्लेषण हो जाना ही विद्या है। - अ.द. 147
सामाजिक नियम = चरित्र
स्वधन अर्थात् प्रतिफल, पारितोष और पुरस्कार रूप में प्राप्त धन से है।
- स्वनारी और स्व पुरुष-विवाह पूर्वक प्राप्त दाम्पत्य संबंध।
- दया पूर्ण कार्य-व्यवहार अर्थात् अविकसित के विकास में सहायक होने का संपूर्ण कार्य है। जीने देना और जीना ही दया है।